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Monday, 25 May 2026

वह आदमी जो हर समय माफ़ी माँगता था

 वह आदमी जो हर समय माफ़ी माँगता था

अब जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मुझे सबसे पहले उसकी आवाज़ याद आती है।

वह हर बात के बाद “माफ़ कीजिए” कहता था।

इतनी बार कि कुछ समय बाद वह शब्द अर्थ खोने लगता था और केवल उसकी साँसों का हिस्सा लगने लगता था।

यदि आप उसके पास से गुज़र जाएँ और आपका कंधा उससे हल्का-सा छू जाए, तो वह तुरन्त कहेगा —
“माफ़ कीजिए।”

यदि चाय का कप आपको देते समय उसकी उँगली कप से टकरा जाए —
“माफ़ कीजिए।”

यहाँ तक कि कई बार जब गलती आपकी होती, तब भी वही क्षमा माँगता।

वह मेरे एक परिचित के दफ़्तर में काम करता था। उम्र पैंतालीस के आसपास। दुबला शरीर, झुकी हुई गर्दन, और आँखों में हमेशा एक सतर्क डर।

ऐसा लगता था जैसे वह दुनिया में बहुत कम जगह घेरने की कोशिश कर रहा हो।

पहली नज़र में लोग उसे विनम्र समझते थे।
दूसरी नज़र में असहज।
और तीसरी नज़र में लगभग अदृश्य।

उसका कोई स्पष्ट व्यक्तित्व नहीं दिखाई देता था।

वह हर आदमी के सामने अपना व्यवहार बदल लेता। किसी के सामने बहुत सहमत, किसी के सामने बहुत विनीत, किसी के सामने लगभग दासवत्।

जैसे उसके भीतर अपना कोई स्थिर आकार ही न हो।

धीरे-धीरे मैंने उसके बारे में बातें सुनीं।

कहा जाता था कि बचपन में उसका पिता बहुत कठोर था। छोटी-छोटी बातों पर डाँटता, अपमानित करता, कभी-कभी मारता भी। घर में हर समय ऐसा वातावरण रहता जिसमें गलती होने का डर बना रहे।

शायद कुछ लोग बचपन में इतने अधिक दोषी ठहरा दिए जाते हैं कि बड़े होकर बिना अपराध के भी अपराध-बोध महसूस करने लगते हैं।

उसके साथ शायद यही हुआ था।

दफ़्तर में वह सबसे पहले आता और सबसे बाद में जाता। कोई भी अतिरिक्त काम मना नहीं कर पाता। लोग अपनी फाइलें उसके ऊपर डाल देते। वह हल्की मुस्कान के साथ सब कर देता।

लेकिन विचित्र बात यह थी कि लोग उससे प्रेम नहीं करते थे।

वे उसका उपयोग करते थे।

क्योंकि अत्यधिक विनम्र मनुष्य धीरे-धीरे दूसरों के भीतर सम्मान नहीं, एक छिपी हुई क्रूरता जगा देता है।

एक बार मैंने उसे चाय की दुकान पर अकेले बैठे देखा।

वह बिस्कुट को चाय में डुबोते समय भी बहुत सावधानी बरत रहा था, जैसे किसी अदृश्य नियम का पालन कर रहा हो।

मैं उसके पास बैठ गया।

कुछ देर सामान्य बातें होती रहीं। फिर अचानक उसने कहा —

“आपको कभी ऐसा लगता है कि आप जहाँ भी हों, वहाँ अतिरिक्त हैं?”

उसने यह बात बहुत शान्त स्वर में कही।

मैंने उत्तर नहीं दिया।

वह हल्का-सा मुस्कुराया।

“मुझे हमेशा लगता है कि लोग मुझे बस सह रहे हैं।”

उसकी आँखें उस समय चाय के कप पर टिकी थीं।

मैंने पहली बार गौर किया — वह बोलते समय सामने वाले की आँखों में बहुत कम देखता था। जैसे भीतर कहीं पहले से विश्वास हो कि सामने वाला अन्ततः उसे अस्वीकार ही करेगा।

धीरे-धीरे उसकी आदतें और स्पष्ट होने लगीं।

वह एक ही ईमेल कई बार पढ़ता, यह सुनिश्चित करने के लिए कि कहीं कोई शब्द कठोर न लग जाए।
फोन रखने के बाद देर तक सोचता रहता कि उसने कुछ गलत तो नहीं कह दिया।
यदि कोई सहकर्मी अचानक कम बोल दे, तो पूरा दिन परेशान रहता कि शायद वह उससे नाराज़ है।

वह लगातार दूसरों के मन का अनुमान लगाता रहता था।

जैसे उसका अपना अस्तित्व केवल दूसरों की स्वीकृति पर टिका हो।

एक दिन दफ़्तर में एक छोटी-सी घटना हुई।

बॉस ने सबके सामने उसे डाँट दिया। गलती उसकी नहीं थी, फिर भी वह बार-बार कहता रहा —
“जी, माफ़ कीजिए… आगे से ध्यान रखूँगा…”

उस क्षण मुझे उसके चेहरे पर जो भाव दिखाई दिया, वह अपमान का नहीं था।

बल्कि एक अजीब राहत का था।

मानो दोष अपने ऊपर ले लेने से भीतर की कोई पुरानी व्यवस्था फिर सुरक्षित हो गई हो।

उस शाम वह देर तक दफ़्तर में बैठा रहा। सब लोग जा चुके थे।

मैंने पूछा —
“घर नहीं जाएँगे?”

उसने धीरे से कहा —

“घर जाऊँगा तो सोचता रहूँगा कि सब लोग मेरे बारे में क्या सोच रहे होंगे।”

अब सोचता हूँ, उसका असली संकट भय नहीं था।

वह स्वयं को एक स्वतंत्र व्यक्ति की तरह महसूस ही नहीं कर पाता था।

उसका पूरा मानसिक संसार दूसरों की प्रतिक्रिया के चारों ओर बना था।

यदि कोई मुस्कुरा दे — वह हल्का हो जाता।
यदि कोई चुप रहे — वह बेचैन।
यदि कोई नाराज़ हो जाए — वह भीतर से टूट जाता।

कुछ वर्षों बाद सुनने में आया कि उसे घबराहट के दौरे पड़ने लगे हैं। दफ़्तर छोड़ दिया। अब बहुत कम बाहर निकलता है।

कभी-कभी रास्ते में दिख जाता है। पहले से और दुबला। चलते समय अब भी लोगों को रास्ता देने के लिए बहुत किनारे हो जाता है।

और आज भी, यदि अनजाने में आप उससे टकरा जाएँ, तो सबसे पहले वही कहेगा —

“माफ़ कीजिए।”

हालाँकि शायद पूरी ज़िन्दगी में सबसे कम गलती उसी की थी।


मुकेश ,,,,,,,,,

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