होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Thursday, 28 May 2026

मिट्टी में लौटते हुए चेहरे

 
बरसात लगातार तीसरे दिन भी हो रही थी।

पुराने मकान की दीवारों में नमी उतर आई थी। चूने की सतह जगह-जगह से फूल गई थी और खिड़की के पास लकड़ी का रंग गहरा होकर लगभग काला पड़ने लगा था। बाहर आँगन में जमा पानी में पीपल की टेढ़ी शाखाएँ काँपती हुई दिखाई देती थीं। हवा में भीगी मिट्टी, काई और पुराने लोहे की मिली-जुली गंध थी।

ऊपर की मंज़िल पर वही कमरा था जहाँ वह वर्षों से काम करता था।

कमरे में घुसते ही सबसे पहले मिट्टी की गंध महसूस होती थी— कच्ची, ठंडी, नम। उसके बाद धीरे-धीरे आँखें अँधेरे और रोशनी के बीच अभ्यस्त होतीं और दीवारों के सहारे रखे चेहरे दिखाई देने लगते।

कुछ चेहरे पूरे थे।
कुछ आधे।
कुछ केवल माथे तक।
कुछ में आँखें थीं लेकिन होंठ नहीं।
कुछ ऐसे लगते थे मानो किसी ने बात करते-करते अचानक चुप हो जाना स्वीकार कर लिया हो।

कमरे के बीचोंबीच लकड़ी की एक बड़ी मेज़ थी, जिस पर गीली मिट्टी फैली रहती। लोहे के पतले औज़ार, तार, पानी का कटोरा, गंदे कपड़े, टूटे हुए प्लास्टर के टुकड़े और सूख चुकी मिट्टी की महीन धूल हर जगह बिखरी रहती थी।

उस शाम भी वह उसी मेज़ के सामने बैठा था।

पीली टेबल-लैंप की रोशनी उसके झुके हुए चेहरे और हाथों पर पड़ रही थी। उँगलियों की पोरों में मिट्टी भर गई थी। हथेलियों की रेखाओं तक में भूरी नमी चिपकी हुई थी।

उसके सामने एक नया चेहरा धीरे-धीरे बन रहा था।

वह बहुत सावधानी से गालों की ढलान ठीक कर रहा था। बीच-बीच में थोड़ा पीछे हटकर देखता, फिर लौटकर मिट्टी को हल्का दबा देता। उसकी साँसें भी जैसे उसी लय में चलती थीं जिसमें उँगलियाँ मिट्टी पर चल रही थीं।

चेहरे का आकार अब लगभग उभर आया था।

हल्का लंबा माथा।
थोड़ी थकी हुई आँखें।
और होंठों पर वैसा ठहराव जैसे कोई बहुत समय से कोई बात भीतर दबाए बैठा हो।

वह देर तक उसे देखता रहा।

फिर बहुत धीमे से, लगभग अपने भीतर बोलते हुए कहा—

“तुम्हारे बाल पहले इतने छोटे नहीं थे…”

कमरे में कोई उत्तर नहीं था।
केवल खिड़की पर गिरती बारिश की आवाज़।


उसे हमेशा लगता था कि लोग वास्तव में चले नहीं जाते।

वे चीज़ों में छिप जाते हैं।

पुरानी किताबों में।
कपड़ों की तहों में।
तकियों की धँसी जगहों में।
कमरों की गंध में।

और सबसे अधिक— चेहरे की स्मृति में।

उसे लोगों के चेहरे असामान्य स्पष्टता से याद रहते थे।

वर्षों बाद भी।

किसी की पलक झपकाने की गति।
हँसते समय दाँतों का हल्का टेढ़ापन।
गर्दन मोड़ने का ढंग।
बात करते हुए आँखों में अचानक उतर आने वाली उदासी।

कई बार उसे स्वयं आश्चर्य होता कि उसे लोगों की बातें याद नहीं रहतीं, लेकिन उनके चेहरे की थकान याद रहती है।

पहली बार उसने मिट्टी तब उठाई थी जब घर अचानक बहुत खाली हो गया था।

इतना खाली कि रात में चलते समय अपनी ही आहट अजनबी लगती थी।

उसने कई दिनों तक उस खालीपन से बचने की कोशिश की थी। किताबें पढ़ीं। देर तक सड़कें नापीं। रेडियो चलाकर सोया। लेकिन हर चीज़ के नीचे वही मौन पड़ा रहता।

फिर एक दोपहर उसने बिना सोचे मिट्टी उठा ली।

उसे ठीक से पता भी नहीं था कि वह क्या बना रहा है।

बस उँगलियाँ चलती रहीं।

धीरे-धीरे एक चेहरा निकलने लगा।

जब वह पूरा हुआ तो उसे लगा कमरे में कोई और भी मौजूद है।

उस रात कई महीनों बाद उसे नींद आई थी।

शायद तभी से उसने खोए हुए लोगों को मिट्टी में वापस बुलाना शुरू कर दिया।


लेकिन एक विचित्र बात थी।

हर नई मूर्ति शुरू करते समय उसे लगता—
इस बार भीतर का खाली हिस्सा भर जाएगा।

और हर बार मूर्ति पूरी होते-होते भीतर एक दूसरी रिक्तता जन्म ले लेती।

जैसे स्मृति को आकार देने से उसका जीवित कंपन समाप्त हो जाता हो।

फिर भी वह रुक नहीं पाता था।

क्योंकि मूर्ति बनाते समय कुछ क्षण ऐसे आते थे जब उसे सचमुच लगता— सामने बैठा व्यक्ति अभी बोल पड़ेगा।

और शायद वही क्षण उसके जीवित रहने के लिए पर्याप्त थे।


बाहर बिजली चमकी।

कमरे की दीवारों पर रखे चेहरों की छायाएँ एक पल के लिए काँप उठीं।

उसने सिर उठाकर कमरे को देखा।

रात में उसे अपनी मूर्तियाँ अलग लगती थीं।

दिन में वे केवल मिट्टी थीं।
रात में वे प्रतीक्षा बन जाती थीं।

कुछ चेहरों पर धूल जम गई थी।
कुछ की आँखों में नमी चमक रही थी।
एक मूर्ति के होंठों पर सूखी मिट्टी की महीन दरार थी, जिससे लगता था मानो वह अभी कुछ कहने वाली हो।

उसने कई बार सोचा था कि इतनी मूर्तियाँ हटा दे।

लेकिन हटाता नहीं था।

उसे डर लगता था कि खाली दीवारें उससे अधिक भयावह होंगी।


उसने फिर सामने रखे चेहरे की ओर देखा।

अब केवल आँखें बाकी थीं।

उसे हमेशा आँखें बनाते समय बेचैनी होती थी।

क्योंकि आँखें बनते ही मिट्टी अचानक “चेहरा” हो जाती थी।

वह बहुत धीरे-धीरे पलकों की रेखा उभारने लगा।

बाहर बारिश अब और महीन हो गई थी। कहीं दूर ट्रेन की आवाज़ आई और फिर धीरे-धीरे डूब गई।

उसने दाहिनी आँख के कोने को थोड़ा दबाया।

फिर अचानक उसका हाथ रुक गया।

उसे लगा— सामने की आँखें स्थिर नहीं हैं।

बहुत हल्का-सा बदलाव।

जैसे कोई देखने की कोशिश कर रहा हो।

उसने सिर पीछे किया।

कुछ क्षण तक बिल्कुल नहीं हिला।

कमरे में केवल पानी टपकने की आवाज़ थी।

फिर भी उसे महसूस हो रहा था कि उस चेहरे के भीतर अब केवल मिट्टी नहीं बची।

एक बहुत पुरानी अनुभूति धीरे-धीरे उसके भीतर लौटने लगी— वैसी ही, जैसी बचपन में अँधेरे कमरे में अकेले जाग जाने पर होती थी।

उसने अपनी हथेलियाँ घुटनों पर रख लीं ताकि काँपना दिखाई न दे।

फिर दुबारा देखने लगा।

चेहरा वैसा ही था।

लेकिन अब उसकी आँखों में एक अजीब-सी प्रतीक्षा थी।

जैसे कोई बहुत समय से कुछ कहना चाहता हो।


कमरे में नमी और बढ़ गई थी।

पीली रोशनी मिट्टी की सतह पर चमक रही थी। गालों के पास पानी की बहुत महीन परत थी। होंठों की रेखा में हल्की छाया भर गई थी।

उसने बहुत धीरे से हाथ बढ़ाया।

उँगलियाँ गाल तक पहुँचीं।

मिट्टी ठंडी थी।

लेकिन उसी क्षण उसे लगा—
उस ठंडक के भीतर कहीं बहुत हल्की मानवीय गरमाहट बची हुई है।

उसने तुरंत हाथ खींच लिया।

साँसें थोड़ी तेज़ हो गई थीं।

बाहर बारिश लगभग रुक चुकी थी।

पीपल से पानी अब भी टपक रहा था।
कमरे में मिट्टी की गंध और भारी हो गई थी।
दीवारों पर रखे चेहरे अँधेरे में आधे डूबे थे।

कुछ देर बाद वह फिर उसी कुर्सी पर बैठ गया।

ठीक वैसे ही जैसे शाम को बैठा था।

सामने वही अधूरी आँखें।
वही पीली रोशनी।
वही गीली मिट्टी।

और वही धीमा, फैलता हुआ खालीपन
जिसे वह वर्षों से आकार देने की कोशिश कर रहा था।

मुकेश ,,,,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment