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Sunday, 24 May 2026

प्रश्नोपनिषद् — प्रथम प्रश्न — दशम मंत्र उत्तरायण, देवयान और आत्मप्राप्ति का उपनिषदिक मार्ग

प्रश्नोपनिषद् — प्रथम प्रश्न — दशम मंत्र

उत्तरायण, देवयान और आत्मप्राप्ति का उपनिषदिक मार्ग

मंत्र का मूल संस्कृत पाठ

अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानमन्विष्य
आदित्यमभिजयन्ते ।
एतद्वै प्राणानामायतनम् ।
एतदमृतमभयम् ।
एतत्परायणम् ।
एतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधः ।
तदेष श्लोकः ॥१०॥

 

मंत्र का हिन्दी अनुवाद

जो लोग तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा और विद्या के द्वारा आत्मा का अन्वेषण करते हैं, वे आदित्य को प्राप्त होते हैं।

यही समस्त प्राणों का आश्रय है।
यही अमृत और अभय है।
यही परम गन्तव्य है।
इसे प्राप्त कर वे पुनः संसार में नहीं लौटते — यही पुनर्जन्म का निरोध है।

 

भावार्थ

यह मंत्र प्रश्नोपनिषद् के प्रथम प्रश्न का आध्यात्मिक उत्कर्ष है।

पूर्व मंत्रों में — कर्ममार्ग, पितृयान, चन्द्रलोक का वर्णन था।

अब यहाँ — ज्ञानमार्ग, आत्मान्वेषण, और मोक्ष का प्रतिपादन है।

 

अन्वय

अथ ये तपसा, ब्रह्मचर्येण, श्रद्धया, विद्यया आत्मानम् अन्विष्य उत्तरायणेन आदित्यम् अभिजयन्ते।
एतत् वै प्राणानाम् आयतनम्।
एतत् अमृतम् अभयम् एतत् परायणम्।
एतस्मात् न पुनः आवर्तन्ते।
एषः निरोधः।

 

 

संधि-विच्छेद

संधियुक्त पद

विच्छेद

संधि प्रकार

अथोत्तरेण

अथ + उत्तरेण

स्वर संधि

विद्ययाऽऽत्मानम्

विद्यया + आत्मानम्

स्वर संधि

आदित्यमभिजयन्ते

आदित्यम् + अभिजयन्ते

व्यंजन संधि

एतद्वै

एतत् + वै

व्यंजन संधि

प्राणानामायतनम्

प्राणानाम् + आयतनम्

स्वर संधि

एतदमृतम्

एतत् + अमृतम्

व्यंजन संधि

पुनरावर्तन्ते

पुनः + आवर्तन्ते

विसर्ग संधि

 

शब्दार्थ एवं व्याकरणिक विश्लेषण

१. तपसा : तप् धातु। आन्तरिक अनुशासन, आत्मसंयम।

२. ब्रह्मचर्येण : ब्रह्मणि चरति इति। केवल इन्द्रियनिग्रह नहीं; ब्रह्मचिन्तनयुक्त जीवन।

३. श्रद्धया : सत्य के प्रति आस्था। आध्यात्मिक ग्रहणशीलता। 

४. विद्यया : यहाँ “अपरा विद्या” नहीं, आत्मविद्या।

५. आत्मानमन्विष्य : -आत्मा का अनुसन्धान करके। यही उपनिषदिक साधना का केन्द्र है।

६. आदित्य :- यहाँ सूर्य — परमप्रकाश, ब्रह्मचेतना, देवयान का प्रतीक है।

७. आयतनम् :- आश्रय, आधार।

८. अभयम् : - जहाँ द्वैत नहीं, वहाँ भय नहीं।

९. निरोधः : - पुनर्जन्म का अवरोध। संसारचक्र का अन्त।

आदि शंकराचार्य भाष्य (संशोधित एवं शुद्ध रूप)

अथ उत्तरेण अयनेन प्रजापतेः अंशं प्राणमत्तारम् आदित्यमभिजयन्ते। केन? तपसा इन्द्रियजयेन, विशेषतः ब्रह्मचर्येण, श्रद्धया, विद्यया च प्रजापत्यात्मविषयया आत्मानं प्राणं सजगतो जगतस्तस्थुषश्च अन्विष्य “अहमस्मि” इति। ते आदित्यमभिजयन्ते अभिप्राप्नुवन्ति। एतत् वै प्राणानामायतनं सर्वप्राणानां सामान्याश्रयम्। एतद् अमृतम् अविनाशि, अभयम् अत एव भयवर्जितम्। न च चन्द्रवत् क्षयधर्म। एतत् परायणं प्राप्तव्यं कर्मिणां च तत्। एतस्मात् न पुनरावर्तन्ते। यथोक्तं कर्मफलवत् पुनर्जन्म न। तस्मात् ब्रह्मविदः आदित्याद् ऊर्ध्वं गत्वा आत्मानं प्राणम् अभिसम्पद्यन्ते। स एष संवत्सरः कल्पाद्यर्चिषादिमार्गनिरोधः। तत्र एष श्लोकः॥

शंकरभाष्य का हिन्दी अनुवाद

शंकराचार्य कहते हैं —

जो साधक तप, इन्द्रियनिग्रह, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा और आत्मविद्या के द्वारा आत्मा का अनुसन्धान करते हैं, वे आदित्यरूप प्राण को प्राप्त होते हैं।

वे अनुभव करते हैं — “मैं वही प्राणस्वरूप आत्मा हूँ।”

यह आदित्य समस्त प्राणियों का आश्रय है। यह — अमृत, अविनाशी, अभय, तथा परम गन्तव्य है।

यह चन्द्रलोक की भाँति क्षयशील नहीं। इसे प्राप्त कर ज्ञानी पुनः संसार में नहीं लौटते।

 

दार्शनिक विवेचन

१. दक्षिणायन से उत्तरायण की यात्रा

पिछले मंत्र में कर्ममार्ग था।यहाँ ज्ञानमार्ग है।

दक्षिणमार्ग

उत्तरमार्ग

कर्म

ज्ञान

चन्द्र

सूर्य

पुनर्जन्म

मोक्ष

पितृयान

देवयान

 

२. आत्मानमन्विष्य : - यह उपनिषदिक साधना का केन्द्र है। ज्ञान बाहर नहीं; आत्मा के अनुसन्धान में है।

३. तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा, विद्या : - उपनिषद् आत्मज्ञान के चार आधार देता है —

साधन

अर्थ

तप

आत्मसंयम

ब्रह्मचर्य

ऊर्जा का संरक्षण

श्रद्धा

सत्य में विश्वास

विद्या

आत्मज्ञान

 

४. आदित्य का प्रतीक : यहाँ आदित्य केवल सूर्य नहीं। वह — परमप्रकाश, ब्रह्म, आत्मा, मुक्तचेतना का प्रतीक है।

५. अभय : बृहदारण्यक उपनिषद् कहता है — “द्वितीयाद्वै भयं भवति।” अद्वैत में भय नहीं।

६. पुनरावर्तन का अभाव : -यह मोक्ष की परिभाषा है। जहाँ से लौटना नहीं, जहाँ पुनर्जन्म नहीं।

 

अन्य उपनिषदों से साम्य

मुण्डक उपनिषद् : -“परिक्ष्य लोकान् कर्मचितान्…”कर्म से परे ज्ञानमार्ग।

कठोपनिषद् : “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यः…”

बृहदारण्यक उपनिषद् : - “अभयं वै जनक…”

 

शोधपूर्ण निबंध

देवयान : आत्मा की सूर्य की ओर यात्रा

प्रश्नोपनिषद् का दशम मंत्र भारतीय आध्यात्मिक परम्परा के सर्वोच्च आदर्श — मोक्ष — का उद्घाटन करता है।

यहाँ मनुष्य को केवल कर्मशील प्राणी नहीं माना गया। उसे आत्मसाक्षात्कार की क्षमता से युक्त चेतन सत्ता माना गया है।

उपनिषद् स्पष्ट कहता है कि केवल कर्म पर्याप्त नहीं। कर्म संसार को व्यवस्थित रखता है, पर आत्मा को मुक्त नहीं करता।

मुक्ति के लिए आवश्यक है — तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा, और आत्मविद्या।

यहाँ “आदित्य” अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रतीक है। सूर्य बाह्य प्रकाश देता है; आत्मज्ञान आन्तरिक प्रकाश।

उत्तरायण इस आन्तरिक आरोहण का प्रतीक है। यह बाह्य दिशा नहीं; चेतना की दिशा है।

शंकराचार्य इस मंत्र को अद्वैत वेदान्त के आलोक में देखते हैं। उनके अनुसार साधक अन्ततः अनुभव करता है —

“अहमस्मि।” यही आत्मबोध मोक्ष है।

प्रश्नोपनिषद् का दशम मंत्र कर्म से ज्ञान की यात्रा का उद्घोष है।

यह बताता है कि —आत्मज्ञान ही अमृत है, वही अभय है, वही परम आश्रय है, और वही पुनर्जन्म का अन्त करता है।

इस प्रकार यह मंत्र उपनिषदों की समग्र साधना-पद्धति का सार प्रस्तुत करता है —
बाह्य यज्ञ से आन्तरिक ज्योति की ओर,कर्म से आत्मबोध की ओर,
और चन्द्रलोक से सूर्यस्वरूप ब्रह्म की ओर।

मुकेश ,,,,,,,

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