आकाश सफेद था। बादल नहीं थे, फिर भी रोशनी धुँधली लगती थी। शहर के पुराने हिस्से की गलियों में हवा रुकी हुई थी। कहीं-कहीं पिघले तारकोल की गंध उठती थी।
अभिलेखागार की इमारत के भीतर गरमी और भी स्थिर हो जाती।
उस दिन तारीख थी— 17 सितंबर।
ऊपर तीसरी मंज़िल के कमरे में हमेशा की तरह वही पुराना पंखा घूम रहा था। उसके पंखों पर धूल जम गई थी और हर चक्कर के साथ हल्की काँपती आवाज़ निकलती—
चर्र… ठक… चर्र…
कमरे में लकड़ी की लंबी अलमारियाँ थीं जिनमें फाइलें इतनी भरी थीं कि कई जगह कागज़ बाहर झाँकते रहते। कुछ पुराने बक्सों पर धूप की एक तिरछी पट्टी पड़ी थी जिसमें उड़ती धूल बहुत धीरे चमक रही थी।
वह उस दिन प्रेमपत्रों की नहीं, निजी डायरियों की छँटाई कर रहा था।
पुराने चमड़े की जिल्द वाली डायरियाँ।
कुछ पर नाम थे।
कुछ बिना नाम की।
उसने एक गहरे हरे रंग की डायरी खोली।
पहले ही पन्ने पर लिखावट असामान्य लगी।
अक्षर बहुत सीधे थे— लगभग सैनिकों की चाल जैसे। हर शब्द के बीच बराबर दूरी। “त” और “ल” की ऊर्ध्व रेखाएँ अस्वाभाविक रूप से लंबी।
लेकिन कुछ और भी था।
हर पंक्ति धीरे-धीरे ऊपर चढ़ रही थी।
उसने कुर्सी खींचकर थोड़ा पास आकर देखा।
Graphology की एक पुस्तक में उसने पढ़ा था—
“अत्यधिक नियंत्रित सीधी लिखावट और ऊपर चढ़ती पंक्तियाँ अक्सर ऐसे व्यक्तित्व में मिलती हैं जो भीतर असुरक्षा छिपाकर बाहरी अनुशासन निर्मित करता है।”
उसने डायरी के अगले पन्ने पलटे।
हर वाक्य छोटा था।
लगभग भावहीन।
“आज फिर नींद कम हुई।”
“लोगों से मिलना थकाता है।”
“गलतियाँ नहीं होनी चाहिए।”
वह देर तक उन शब्दों को देखता रहा।
धीरे-धीरे उसके भीतर एक आदमी बनने लगा।
पतला चेहरा।
बहुत करीने से तह किए कपड़े।
टेबल पर चीज़ें बिल्कुल सीधी पंक्ति में रखने की आदत।
और भीतर लगातार फैलता हुआ भय कि कहीं कुछ बिखर न जाए।
उसे लगा— यह आदमी लोगों को नियंत्रित नहीं, स्वयं को नियंत्रित करते-करते थक गया होगा।
उसने नोटबुक में लिखा—
“Obsessive structure.
भावनाओं को रेखाओं के भीतर कैद करने का प्रयास।”
ऊपर पंखा घूमता रहा।
गरमी में उसके कानों के पास पसीना जमा होने लगा था।
दोपहर के लगभग तीन बजे उसने दूसरी डायरी खोली।
कागज़ सस्ते थे। किनारे पसीने से कई जगह लहरदार हो गए थे।
लेकिन लिखावट…
वह लिखावट बेचैन थी।
शब्द आगे की ओर भागते हुए।
कई अक्षर दूसरे शब्दों पर चढ़े हुए।
कुछ जगहों पर स्याही इतनी गहरी कि कागज़ पीछे तक दब गया था।
वह अचानक सतर्क हो गया।
ऐसी लिखावटें उसे हमेशा विचलित करती थीं।
उसने धीरे-धीरे पढ़ना शुरू किया।
“मैंने कोशिश की थी…”
“वह झूठ बोल रहा था…”
“मुझे देख रहे थे…”
हर तीसरे-चौथे वाक्य के बाद अचानक रेखा टूट जाती।
Graphology के अनुसार अत्यधिक दबाव, असमान गति और शब्दों का एक-दूसरे पर चढ़ना कई बार paranoid मानसिक स्थिति की ओर संकेत करता है।
उसे लगा यह आदमी चलते समय बार-बार पीछे मुड़कर देखता होगा।
उसने कल्पना की
रात।
गरम कमरा।
पसीने से भीगी बनियान।
और कोई आदमी मेज़ पर झुककर जल्दी-जल्दी लिख रहा है क्योंकि उसे लगता है कि समय कम है।
शायद वह सचमुच बीमार था।
या शायद केवल अकेला।
अक्सर दोनों में अंतर करना कठिन होता है।
चार बजे तक कमरा भट्ठी जैसा हो गया था।
उसने खिड़की थोड़ी खोली लेकिन बाहर से भी गर्म हवा ही आई।
नीचे सड़क पर बर्फ वाला अपनी घंटी बजाता हुआ निकला। आवाज़ ऊपर तक आई और फिर धीरे-धीरे डूब गई।
उसने तीसरी फाइल खोली।
यह एक स्त्री के पत्र थे।
हल्के बैंगनी कागज़ पर नीली स्याही।
लिखावट पहली नज़र में बहुत सुंदर लगती थी।
गोल अक्षर।
संतुलित रिक्तियाँ।
साफ़ शब्द।
लेकिन जितनी देर वह देखता गया, उतनी बेचैनी बढ़ती गई।
हर “क्यों” शब्द पर दबाव अचानक गहरा हो जाता था।
“मैं ठीक हूँ” लिखते समय आखिरी शब्द हल्का काँप जाता।
और सबसे विचित्र— हर पंक्ति शुरू तो सीधी होती लेकिन अंत तक धीरे-धीरे नीचे गिर जाती।
उसने कुर्सी पर सिर टिकाया।
उसे ऐसी लिखावटों में हमेशा दबा हुआ अवसाद महसूस होता था।
वे लोग जो बाहर से व्यवस्थित दिखाई देते हैं लेकिन भीतर लगातार मान्यता चाहते रहते हैं।
पत्र में लिखा था—
“मुझे लगता है लोग मेरी बात सुनते हैं, समझते नहीं।”
वह इस वाक्य पर देर तक रुका रहा।
उसे अचानक उस स्त्री का कमरा दिखाई देने लगा।
दोपहर की धूप से गरम परदे।
ड्रेसिंग टेबल पर खुला हुआ पाउडर बॉक्स।
और एक स्त्री जो पत्र लिखते-लिखते बीच में रुक जाती है क्योंकि उसे लगता है— सामने वाला फिर भी उसे ठीक से नहीं समझेगा।
उसने अनायास अपनी उँगलियों से उस लिखावट को छुआ।
स्याही अब भी हल्की उभरी हुई थी।
उसे लगा—
मनुष्य अपने स्पर्श से कम, अपनी लिखावट में अधिक बचा रहता है।
उस दिन घर लौटते समय उसे अजीब थकान महसूस हुई।
बस की खिड़की से बाहर देखते हुए वह राह चलते लोगों की उँगलियाँ देखने लगा।
किसी के हाथ में थैला था।
कोई टिकट पकड़े हुए था।
कोई मोबाइल पर कुछ लिख रहा था।
और वह हर हाथ के पीछे एक लिखावट की कल्पना करने लगा।
धीरे-धीरे उसे लगने लगा कि पूरा शहर अदृश्य लिखावटों से भरा हुआ है।
हर आदमी अपने भीतर का कोई अधूरा भय, कोई इच्छा, कोई शिकायत अपने अक्षरों में छिपाकर चल रहा है।
और ऊपर कहीं
सितंबर की गर्म, थकी हुई शाम
धीरे-धीरे शहर पर उतर रही थी।
मुकेश ,,,,,,,,,
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