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Thursday, 28 May 2026

लिखावट में दर्ज़ इंसान

 गरमी उस वर्ष कुछ ज़्यादा लंबी चली थी।

दोपहरें इतनी स्थिर और भारी हो जातीं कि शहर की सड़कें दूर से पिघलती हुई दिखाई देतीं। हवा चलती भी तो गर्म लोहे जैसी लगती। पुराने पेड़ों के पत्ते धूल से सफेद पड़ गए थे और इमारतों की दीवारों में दिन भर की धूप देर रात तक भरी रहती।

अभिलेखागार की पुरानी इमारत उस उमस को और भी भारी बना देती थी।

ऊँची छतें।
मोटी दीवारें।
और भीतर बंद पड़ा हुआ समय।

तीसरी मंज़िल वाले कमरे में केवल एक पुराना पंखा था जो लगातार काँपता हुआ घूमता रहता। उसके घूमने से हवा कम और आवाज़ अधिक पैदा होती— चर्र… चर्र… चर्र…

उस आवाज़ में धीरे-धीरे एक अजीब-सी थकान घुली रहती थी।

दोपहर के समय पूरा अभिलेखागार लगभग खाली हो जाता। नीचे के कमरों में कभी-कभी किसी फाइल के बंद होने की आवाज़ आती, फिर सब शांत।

ऊपर केवल वही होता।

और कागज़।

बहुत सारे कागज़।

पुरानी फाइलों, डायरियों और पत्रों से गरम कागज़ की एक विशिष्ट गंध उठती थी— धूल, पसीना, सूखी स्याही और समय की गंध।

उस दिन भी वह लकड़ी की लंबी मेज़ के सामने बैठा था। उसकी कमीज़ पीठ से चिपक गई थी। कनपटियों पर पसीना चमक रहा था। बीच-बीच में वह रूमाल से उँगलियाँ पोंछता ताकि कागज़ों पर नमी न लगे।

मेज़ पर पुराने प्रेमपत्रों का एक बंडल खुला पड़ा था।

धागा इतना पुराना हो चुका था कि खोलते समय हल्की-सी भूरी धूल उँगलियों पर रह गई।

ऊपर लगे पंखे की हवा से कागज़ों के कोने धीरे-धीरे काँप रहे थे।

उसने पहला पत्र खोला।

स्याही हल्की भूरी पड़ चुकी थी।

लिखावट दाईं ओर झुकी हुई थी, लेकिन हर शब्द जैसे जल्दी में लिखा गया हो। कुछ अक्षर अधूरे। कई जगह कलम का दबाव अचानक गहरा।

उसने ध्यान से देखा।

फिर कुर्सी पर थोड़ा पीछे टिक गया।

गरमी में उसका सोचने का ढंग और धीमा हो जाता था। जैसे हर विचार भी पसीने से भीग रहा हो।

उसने धीरे से नोटबुक में लिखा—

“अधैर्य।
दबा हुआ क्रोध।
आत्म-नियंत्रण बार-बार टूटता हुआ।”

उसे लगता था कि लिखावट मनुष्य की चाल जैसी होती है।

कोई सीधा चलता है।
कोई झुककर।
कोई भीतर ही भीतर भागता रहता है।

यह आदमी शायद बाहर से सामान्य रहा होगा। लेकिन भीतर लगातार किसी तनाव में।

उसने कल्पना की—
गरम कमरे में बैठा कोई आदमी।
आस्तीनें चढ़ी हुईं।
मेज़ पर आधा बुझा सिगरेट।
और सामने किसी को लिखा जा रहा ऐसा पत्र जिसे भेजने के बाद पछतावा होना तय है।

ऊपर पंखा लगातार चर्र… चर्र… करता घूमता रहा।

दोपहर और भारी हो गई थी।

खिड़की के बाहर धूप सफेद होकर चमक रही थी। सड़क लगभग खाली थी। दूर कहीं रिक्शे वाले की घंटी सुनाई दी और फिर वही स्थिर गर्मी।

उसने दूसरा पत्र उठाया।

इस बार लिखावट बहुत छोटी थी।

इतनी छोटी कि कई शब्द सिमटकर लगभग एक-दूसरे में घुस गए थे।

रेखाएँ सीधी थीं, लेकिन उनमें जीवन नहीं था।

उसने कागज़ को थोड़ा दूर करके देखा।

फिर आँखें बंद कर लीं।

उसे ऐसे अक्षरों में हमेशा बीमारी दिखाई देती थी।

Graphology की एक पुरानी किताब में उसने पढ़ा था—

“जब लिखावट क्रमशः सिकुड़ने लगे, दबाव असमान हो जाए और अक्षर अपने भीतर मुड़ने लगें, तो यह लंबे शारीरिक या मानसिक क्षय की ओर संकेत कर सकता है।”

उसने उँगलियों से कागज़ छुआ।

कागज़ गरम था।

कमरे की उमस अब इतनी बढ़ गई थी कि पुरानी स्याही की गंध तक भारी लगने लगी थी।

उसे अचानक लगा,
यह पत्र किसी ऐसे आदमी ने लिखा होगा जिसे अपने शरीर पर भरोसा धीरे-धीरे कम होता जा रहा था।

जैसे हाथ अब उसके अपने न रह गए हों।

उसने कल्पना की

दोपहर का कमरा।
टेबल पर दवाइयाँ।
धीरे काँपता हाथ।
और हर शब्द लिखने में लगती अतिरिक्त सावधानी।

उसने नोटबुक बंद कर दी।

कुछ क्षण तक केवल पंखे की आवाज़ सुनता रहा।


सबसे कठिन स्त्रियों की लिखावटें होती थीं।

क्योंकि वे अक्सर अपने वास्तविक भावों को छिपाकर लिखती थीं।

कम-से-कम उसे ऐसा लगता था।

उसने तीसरा पत्र खोला।

नीली स्याही।

साफ़, सुंदर अक्षर।

लेकिन हर “मैं” शब्द बाकी शब्दों से थोड़ा गहरा लिखा गया था।

“समझना” शब्द पर दबाव अधिक था।

और हर पंक्ति के अंत में रेखा हल्की नीचे गिर जाती थी।

वह देर तक उसे देखता रहा।

फिर बहुत धीमे से बोला

“यह स्त्री लगातार समझे जाने की प्रतीक्षा में रही होगी।”

उसे लगा जैसे वह स्त्री बात करते-करते अचानक चुप हो जाती होगी।
फिर मुस्करा देती होगी ताकि सामने वाला उसकी उदासी न पढ़ ले।

गरमी अब असहनीय हो चुकी थी।

उसने कॉलर ढीला किया।

लेकिन वह पत्र बंद नहीं कर पाया।

उसे कई बार डर लगता था कि वह इन लिखावटों में वास्तविक मनुष्यों से अधिक जीवन देखने लगा है।

कि शायद उसका अपना अकेलापन अब दूसरों के अधूरे वाक्यों से भरता है।

ऊपर पंखा अब भी उसी थकी हुई आवाज़ में घूम रहा था।

चर्र… चर्र… चर्र…

और कमरे में फैली गर्म हवा के बीच
पुराने कागज़ों पर झुके हुए
वह धीरे-धीरे उन लोगों का जीवन जीने लगा था
जिनसे वह कभी मिला भी नहीं था।

मुकेश ,,,,,,,,,



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