होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Thursday, 28 May 2026

लिखवट में दर्ज़ आकृतियां

 पुराने अभिलेखागार की इमारत शहर के उस हिस्से में थी जहाँ शाम बहुत जल्दी उतर आती थी।

ऊँची दीवारें।
लोहे की पुरानी खिड़कियाँ।
और भीतर हमेशा हल्की-सी सीलन।

बरसात के दिनों में वहाँ कागज़ की गंध और भारी हो जाती थी— पुरानी स्याही, धूल, फफूँद और समय की मिली-जुली गंध।

ऊपर तीसरी मंज़िल पर वह कमरा था जहाँ वर्षों पुराने पत्र, डायरियाँ, सरकारी फाइलें और निजी दस्तावेज़ रखे जाते थे।

वहीं वह काम करता था।

दिन भर धूल भरे कागज़ों के बीच।

उसका काम था पुराने दस्तावेज़ों को क्रम में रखना, तारीख़ें दर्ज करना, टूटते हुए कागज़ों को सँभालना। लेकिन धीरे-धीरे उसने अपने काम के भीतर एक दूसरा काम खोज लिया था—

लिखावटों को पढ़ना।

सिर्फ शब्द नहीं।
हाथ की चाल।

उसे लगता था—
मनुष्य अपने कहे हुए झूठ छिपा सकता है, लेकिन उसकी लिखावट उसके भीतर का असंतुलन छिपा नहीं पाती।

धीरे-धीरे उसने graphology पर किताबें पढ़नी शुरू कर दीं।

फ्रेंच विशेषज्ञों की पुरानी पुस्तकें।
अपराध-विज्ञान से जुड़ी रिपोर्टें।
मनोचिकित्सकों के नोट्स।

और फिर वह हर लिखावट को एक चेहरे की तरह देखने लगा।

उस शाम भी बाहर हल्की बारिश हो रही थी।

कमरे में केवल हरे शेड वाला एक पुराना लैम्प जल रहा था।

उसके सामने भूरे रंग का एक बक्सा खुला पड़ा था जिसमें निजी पत्रों का संग्रह था। कई पत्रों पर तारीखें धुँधली हो चुकी थीं। कुछ की स्याही फैल गई थी।

उसने एक पत्र उठाया।

कागज़ पर लिखावट बहुत दबाव से लिखी गई थी। अक्षर दाएँ झुके हुए। कुछ शब्दों के नीचे अनावश्यक रेखाएँ। “र” और “क” की आकृतियाँ बार-बार टूट रही थीं।

वह देर तक उसे देखता रहा।

फिर धीरे से बुदबुदाया—

“यह आदमी भीतर बहुत क्रोध दबाकर रखता था।”

वह अक्सर ऐसे ही अकेले बात करता था।

उसे लगता था लिखावटें सुन रही हैं।

उसने अपनी नोटबुक खोली और लिखा—

“गहरी दबावयुक्त लिखावट।
अस्थिर रेखाएँ।
शब्दों के बीच असमान दूरी।
आत्म-नियंत्रण और हिंसक आवेग के बीच संघर्ष।”

उसे विश्वास था—
यह किसी अपराधी की लिखावट रही होगी।

शायद ऐसा आदमी जो बाहर से विनम्र दिखता हो लेकिन भीतर लगातार किसी को चोट पहुँचाने की कल्पना करता रहता हो।

उसे कई बार आश्चर्य होता कि किसी अनजान आदमी की लिखावट पढ़ते हुए वह उसके जीवन की कल्पना करने लगता है।

धीरे-धीरे वे लोग उसके भीतर रहने लगते।

कुछ देर बाद उसने दूसरा कागज़ खोला।

इस बार लिखावट बहुत काँपती हुई थी।

अक्षर ऊपर की ओर चढ़ते-चढ़ते अचानक नीचे गिर जाते थे। कई जगह स्याही फैल गई थी, जैसे हाथ स्थिर न रहा हो।

उसने उँगलियों से कागज़ को छुआ।

बहुत हल्की दवा जैसी गंध अब भी थी।

वह कुछ देर चुप बैठा रहा।

फिर नोटबुक में लिखा—

“तंत्रिका-संबंधी रोग।
संभवतः chronic degenerative condition.
अक्षरों का क्रमशः सिकुड़ना।
हाथ और इच्छा के बीच दूरी बढ़ती हुई।”

उसे अचानक उस व्यक्ति पर दया हुई।

उसने कल्पना की—

कोई आदमी रात में धीरे-धीरे लिख रहा है।
उसे डर है कि हाथ अब उसका साथ छोड़ देगा।
और इसलिए वह शब्दों को बचाना चाहता है।

उस क्षण उसे लगा—
मनुष्य सबसे अधिक अपनी लिखावट में बूढ़ा होता है।

रात और गहरी हो गई।

खिड़की के बाहर पीली स्ट्रीट लाइट बारिश में धुँधली पड़ रही थी।

उसने तीसरा पत्र खोला।

स्याही जगह-जगह गहरी थी। शब्दों की रेखाएँ बहती हुईं। कुछ अक्षर इतने फैल गए थे कि पढ़ना कठिन हो रहा था।

लेकिन सबसे विचित्र बात थी—
हर पंक्ति थोड़ी नीचे गिरती जा रही थी।

उसने बहुत देर तक उसे देखा।

फिर हल्का-सा मुस्कराया।

“शराब…”

उसे पुराने graphology manual की एक पंक्ति याद आई—

“लगातार नीचे गिरती हुई रेखाएँ और दबाव का असंतुलन अक्सर आत्म-विनाशकारी आदतों की ओर संकेत करते हैं।”

उसने आँखें बंद कर लीं।

और अचानक उसके भीतर एक दृश्य बनने लगा—

एक आदमी आधी रात मेज़ पर झुका हुआ है।
गिलास पास रखा है।
वह किसी को पत्र लिख रहा है जिसे शायद कभी भेजेगा नहीं।

हर वाक्य के बाद रुकता है।
फिर पीता है।
फिर लिखता है।

और धीरे-धीरे शब्द अपने भार से नीचे गिरने लगते हैं।

उसे महसूस हुआ—
वह अब केवल लिखावट नहीं पढ़ रहा।
वह उन लोगों के अधूरे जीवन जीने लगा है।

सबसे अधिक देर तक वह स्त्रियों के पत्र पढ़ता था।

उसे स्त्रियों की लिखावटों में छिपी हुई हिचकियाँ पहचानना आने लगा था।

एक पत्र में अक्षर बहुत सुंदर थे। लगभग कलात्मक। लेकिन हर शब्द के बीच अत्यधिक दूरी थी।

“अकेलापन,” उसने सोचा।

दूसरे में अक्षर छोटे थे, भीतर की ओर सिमटे हुए। “य” और “म” अधूरे।

“लगातार स्वयं को रोके रखने वाली स्त्री।”

फिर एक पत्र आया जिसे पढ़ते हुए वह देर तक चुप रहा।

स्याही नीली थी।

लिखावट साफ़ थी लेकिन कई जगह शब्द अचानक दबाव के साथ गहरे हो जाते थे— विशेषकर “समझना”, “सुनना”, “मैं”, “कभी नहीं” जैसे शब्दों पर।

उसने धीरे से कहा—

“यह स्त्री हमेशा शिकायत करती रही होगी कि कोई उसे सचमुच समझता नहीं।”

वह देर तक उस पत्र को देखता रहा।

धीरे-धीरे उसके भीतर उस स्त्री का चेहरा बनने लगा।

पतली उँगलियाँ।
धीरे बोलने की आदत।
और बात करते-करते अचानक चुप हो जाने का ढंग।

उसे कई बार डर लगता था कि वह वास्तविक लोगों से अधिक इन लिखावटों के साथ जीने लगा है।

घर लौटते समय भी वे लोग उसके भीतर चलते रहते।

बस में बैठे हुए वह सामने बैठे आदमी की लिखावट की कल्पना करता।
दुकानदार की रसीद देखकर उसके स्वभाव का अनुमान लगाने लगता।

धीरे-धीरे वास्तविक जीवन धुँधला होने लगा।

और कागज़ों में छिपे लोग अधिक जीवित।

उसे लगता था—
हर मनुष्य की लिखावट उसके भीतर के उस खाली हिस्से से निकलती है जिसे वह किसी से कह नहीं पाता।

कुछ लोग शब्दों को बहुत दबाकर लिखते हैं— जैसे अपने भीतर का भय छिपा रहे हों।
कुछ बहुत फैलाकर— जैसे दुनिया में जगह माँग रहे हों।
कुछ अक्षरों को अधूरा छोड़ देते हैं— जैसे संबंध अधूरे छोड़ते हों।

रात में कई बार उसे महसूस होता कि पूरा अभिलेखागार उन अधूरी आत्माओं से भरा हुआ है जो अपनी लिखावटों में अब भी जीवित हैं।

और वह—

धीरे-धीरे उनके बीच अपना ही एक काल्पनिक जीवन बनाने लगा था।

मुकेश ,,,,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment