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Sunday, 24 May 2026

प्रश्नोपनिषद् — प्रथम प्रश्न — पंचम मंत्र आदित्य, चन्द्र, रयि और प्राण : सृष्टि के भौतिक एवं चेतन तत्त्वों का उपनिषदिक समन्वय

 प्रश्नोपनिषद् प्रथम प्रश्न पंचम मंत्र

आदित्य, चन्द्र, रयि और प्राण : सृष्टि के भौतिक एवं चेतन तत्त्वों का उपनिषदिक समन्वय

मंत्र का मूल संस्कृत पाठ

आदित्यो वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमाः
रयिर्वा एतत्सर्वं यन्मूर्तं चामूर्तं
तस्मान्मूर्तिर्ेव रयिः ॥५॥

मंत्र का हिन्दी अनुवाद

निश्चय ही आदित्य (सूर्य) प्राण है और चन्द्रमा रयि है।
जो कुछ मूर्त और अमूर्त है यह सम्पूर्ण जगत् रयि ही है।
अतः समस्त मूर्त जगत् रयि स्वरूप है।

भावार्थ

यह मंत्र प्रश्नोपनिषद् के रयि-प्राण सिद्धान्त को और स्पष्ट करता है।

यहाँ सूर्य = प्राण = चेतना = जीवन-ऊर्जा , चन्द्र = रयि = पदार्थ = रूप 

बताया गया है- उपनिषद् सम्पूर्ण जगत् को ऊर्जा और पदार्थ के द्वैतात्मक समन्वय के रूप में देखता है।

अन्वय

आदित्यः वै प्राणः।
चन्द्रमाः एव रयिः।
यत् मूर्तं अमूर्तं एतत् सर्वं रयिः वा।
तस्मात् मूर्तिः एव रयिः।

संधि-विच्छेद

संधियुक्त पद

विच्छेद

संधि प्रकार

आदित्यो

आदित्यः +

विसर्ग संधि

रयिरेव

रयिः + एव

विसर्ग संधि

चन्द्रमाः

चन्द्रमस् + आः

रूपसिद्धि

रयिर्वा

रयिः + वा

विसर्ग संधि

यन्मूर्तं

यत् + मूर्तम्

व्यंजन संधि

चामूर्तं

+ अमूर्तम्

स्वर संधि

तस्मान्मूर्तिः

तस्मात् + मूर्तिः

व्यंजन संधि

शब्दार्थ एवं व्याकरणिक विश्लेषण

. आदित्यः

· सूर्य। यहाँ केवल खगोलीय पिण्ड नहीं, सार्वभौम प्राणशक्ति का प्रतीक। 

. प्राणः

धातु — “अन्” (श्वास लेना)
उपसर्ग — “प्र

अर्थ जीवनगति, चेतना, जीवनशक्ति।

. रयिः - पदार्थ, अन्न, रूप, भौतिक जगत्। 

. मूर्तम् -जो रूपयुक्त है। स्थूल अस्तित्व। 

. अमूर्तम् - सूक्ष्म, अरूप, अप्रकट। 

शंकराचार्य यहाँ सूक्ष्म जगत् को भी रयि में सम्मिलित करते हैं।

 

आदि शंकराचार्य भाष्य (मूल संस्कृत)

तत्र आदित्यः वै प्राणः अत्ता अभिः। रयिः एव चन्द्रमाः। रयिः एव अन्नम्। सः एव। तदेतदेकम् अत्ता अन्नं प्रजापतेः एकं तु मिथुनम्। गुणप्रधानभावेन भेदः। कथम्? रयिवा अन्नं वा एतत्सर्वं यत् मूर्तं अमूर्तं सूक्ष्मं स्थूलं मृतं अमृतं अन्नरूपे रयिः एव। तस्मात् मूर्तेः अमृताख्यादन्यत् मूर्तिरूपं भूतिः सा एव रयिः अमूर्तस्यापि अन्नत्वात्॥

 

शंकरभाष्य का हिन्दी अनुवाद

शंकराचार्य कहते हैं

आदित्य प्राण है, क्योंकि वह समस्त प्राणियों का अत्ताअर्थात् भक्षक और जीवनदाता है। चन्द्रमा रयि है, क्योंकि वह अन्न और पदार्थ का प्रतीक है।

वास्तव में यह सम्पूर्ण जगत् चाहे स्थूल हो या सूक्ष्म, मूर्त हो या अमूर्त सब रयि स्वरूप ही है।

प्राण और रयि वास्तव में प्रजापति के एक ही मिथुन के दो पक्ष हैं। भेद केवल गुणप्रधानता के कारण प्रतीत होता है।

दार्शनिक विवेचन

. सूर्य = प्राण - उपनिषद् सूर्य को केवल प्रकाश का स्रोत नहीं मानता। वह जीवन का केन्द्र है।

· वनस्पति, ऋतु, ऊर्जा, जीवनचक्र सब सूर्य पर आधारित हैं।

इसीलिए कहा आदित्यो वै प्राणः।

. चन्द्र = रयि - चन्द्र यहाँ केवल ग्रह नहीं।

वह रस, पोषण, अन्न, पदार्थ, रूप का प्रतीक है। वैदिक चिन्तन में सोम और चन्द्र का गहरा सम्बन्ध है।

 

. मूर्त और अमूर्त – यह मंत्र अत्यन्त सूक्ष्म बात कहता है

केवल स्थूल पदार्थ ही नहीं, सूक्ष्म जगत् भी रयि है।

अर्थात् विचार, सूक्ष्म शरीर, मानसिक रूप भी प्रकृति के क्षेत्र में आते हैं।

 

. प्राण और रयि का अद्वैत

यद्यपि उपनिषद् रयि और प्राण का द्वैत प्रस्तुत करता है, किन्तु शंकराचार्य कहते हैं

वे वास्तव में प्रजापति के एक ही मिथुन के दो पक्ष हैं।

यहाँ अद्वैत की गहरी छाया दिखाई देती है।

 

. “अत्ताका अर्थ

शंकराचार्य सूर्य को अत्ताकहते हैं अर्थात् भक्षक।

सूर्य समस्त जीवन को उत्पन्न करता है, पोषित करता है, और अन्ततः अपने चक्र में पुनः ले लेता है। 

 

. आधुनिक विज्ञान से साम्य - यदि आधुनिक दृष्टि से देखें

उपनिषद्

आधुनिक अवधारणा

प्राण

ऊर्जा

रयि

पदार्थ

सूर्य

ऊर्जा-स्रोत

चन्द्र

जैविक लय, पदार्थ

यह आश्चर्यजनक है कि उपनिषद् ने प्रतीकात्मक भाषा में ब्रह्माण्डीय संरचना की इतनी सूक्ष्म कल्पना की।

 

अन्य उपनिषदों से साम्य

छान्दोग्य उपनिषद् -छान्दोग्य उपनिषद् में सूर्य और प्राण का सम्बन्ध अनेक स्थलों पर आता है।

 

ऐतरेय उपनिषद्- ऐतरेय उपनिषद् में चेतना को जगत् का मूल कहा गया है।

माण्डूक्य उपनिषद् -माण्डूक्य उपनिषद् में भी स्थूल-सूक्ष्म-कारण अवस्थाओं का विवेचन मिलता है।

 

शोधपूर्ण निबंध

रयि और प्राण : पदार्थ और चेतना का उपनिषदिक विज्ञान

प्रश्नोपनिषद् का पंचम मंत्र भारतीय दर्शन की सबसे सूक्ष्म दार्शनिक अंतर्दृष्टियों में से एक प्रस्तुत करता है। यह जगत् को केवल पदार्थ नहीं मानता, और केवल चेतना। वह दोनों के समन्वय को अस्तित्व का आधार मानता है।

आधुनिक भौतिकवाद पदार्थ को मूल मानता है और चेतना को उसका उत्पाद। किन्तु प्रश्नोपनिषद् चेतना को ब्रह्माण्डीय सत्ता के रूप में देखता है।

सूर्य को प्राण कहना केवल काव्यात्मक रूपक नहीं। सूर्य वास्तव में पृथ्वी पर समस्त जीवन का आधार है। इस प्रकार वैदिक ऋषियों ने प्रकृति को आध्यात्मिक प्रतीकों के माध्यम से समझा।

इसी प्रकार चन्द्र को रयि कहना भी अत्यन्त अर्थपूर्ण है। चन्द्र का सम्बन्ध ज्वार, वनस्पति, रस और जैविक लयों से माना गया। अतः वह पदार्थ और पोषण का प्रतीक बन गया।

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उपनिषद् सूक्ष्म जगत् को भी रयिकहता है। अर्थात् केवल शरीर ही नहीं, मन और विचार भी प्रकृति का भाग हैं।

 

प्रश्नोपनिषद् का पंचम मंत्र भारतीय ब्रह्माण्ड-दर्शन का अत्यन्त परिपक्व सूत्र प्रस्तुत करता है।

यह उद्घाटित करता है कि

· जीवन ऊर्जा और पदार्थ का समन्वय है,

· सूर्य और चन्द्र अस्तित्व के प्रतीकात्मक तत्त्व हैं,

· और सम्पूर्ण दृश्य-अदृश्य जगत् रयि-प्राण की ब्रह्माण्डीय संरचना में स्थित है। 

इस प्रकार यह मंत्र वैदिक प्रतीकवाद, उपनिषदिक दर्शन और अद्वैत की अन्तर्धारा का अद्भुत संगम बन जाता है।

 मुकेश ,,,,,,,

 

 

 

 

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