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Sunday, 24 May 2026

प्रश्नोपनिषद् — प्रथम प्रश्न — चतुर्थ मंत्र प्रजापति, रयि-प्राण और सृष्टि के द्वैत का उपनिषदिक रहस्य

 प्रश्नोपनिषद् प्रथम प्रश्न चतुर्थ मंत्र

प्रजापति, रयि-प्राण और सृष्टि के द्वैत का उपनिषदिक रहस्य

मंत्र का मूल संस्कृत पाठ

तस्मै होवाच 
प्रजाकामो वै प्रजापतिः
तपोऽतप्यत
तपस्तप्त्वा मिथुनमुत्पादयते रयिं प्राणं चेति
एतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यतः इति ॥४॥

 

मंत्र का हिन्दी अनुवाद

उस (कबन्धी) से पिप्पलाद ऋषि ने कहा

प्रजाओं की इच्छा रखने वाले प्रजापति ने तप किया।
उस तप के उपरान्त उसने एक मिथुन (युगल) उत्पन्न किया रयि और प्राण।
उसने विचार किया — ‘ये दोनों मेरे लिए अनेक प्रकार की प्रजाओं की उत्पत्ति करेंगे।’”

 

भावार्थ

यह मंत्र प्रश्नोपनिषद् के सृष्टिदर्शन का मूल है।

यहाँ सृष्टि का कारण

· अराजक संयोग है,

· अन्ध पदार्थ,

· बल्कि चेतन संकल्प है। 

प्रजाकामशब्द बताता है कि सृष्टि के पीछे एक सृजनात्मक इच्छा कार्यरत है।

और उस इच्छा से उत्पन्न होते हैं

· रयि (पदार्थ)

· प्राण (चेतना)

समस्त जगत् इन्हीं दोनों के संयोग से निर्मित होता है।

 

 

 

अन्वय

सः प्रजापतिः प्रजाकामः सन् तपः अतप्यत।
सः तपः तप्त्वा रयिं प्राणं इति मिथुनम् उत्पादयते।
एतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यतःइति।

 

संधि-विच्छेद

संधियुक्त पद

विच्छेद

संधि प्रकार

तस्मै

तस्मै +

रूपसिद्धि

होवाच

सः + + उवाच

विसर्ग संधि

प्रजाकामः

प्रजायाः + कामः

षष्ठीतत्पुरुष

तपोऽतप्यत

तपः + अतप्यत

विसर्ग संधि

तपस्तप्त्वा

तपः + तप्त्वा

विसर्ग संधि

मिथुनमुत्पादयते

मिथुनम् + उत्पादयते

व्यंजन संधि

रयिं

रयिम् +

अनुस्वारादेश

प्राणं चेति

प्राणम् + + इति

व्यंजन संधि

 

शब्दार्थ एवं व्याकरणिक विश्लेषण

. प्रजाकामः

· प्रजा” + “काम

· जो प्रजा उत्पन्न करना चाहता है। 

यहाँ कामलौकिक वासना नहीं; सृजनात्मक इच्छा है।

छान्दोग्य उपनिषद् के

बहु स्याम्

का ही प्रतिध्वनि यहाँ सुनाई देती है।

 

 

 

. प्रजापतिः

· प्रजानां पतिः। 

· सृष्टिकर्ता चेतना। 

· हिरण्यगर्भ का सूचक। 

 

. तपः

उपनिषदों में तप का अर्थ

· सृजनपूर्वक एकाग्रता,

· चेतना का ऊष्मीय संकेन्द्रण,

· ब्रह्मशक्ति का आन्तरिक जागरण। 

 

. मिथुनम्

· युगल। 

· द्वैतात्मक सृष्टि-संरचना। 

यहाँ सम्पूर्ण अस्तित्व को द्वन्द्वात्मक रूप में समझाया गया है।

 

. रयि

रयि = पदार्थ, अन्न, रूप, प्रकृति, चन्द्रतत्त्व।

 

. प्राण

प्राण = चेतना, ऊर्जा, सूर्यतत्त्व, जीवनगति।

 

आदि शंकराचार्य भाष्य (मूल संस्कृत)

तस्मै एवं पृष्टवते होवाच। तदपाकरणाय आह प्रजाकामः प्रजाः आत्मनः सिसृक्षुः प्रजापतिः संवत्सरलक्षणः कालः। अस्य एव विहितान्नपानयोः कर्ता च। अथवा कल्पादौ निदत्तहिरण्यगर्भः सृज्यमानानां प्रजानां स्थावरजङ्गमानां पतिः। जन्मान्तरभावितं ज्ञानं श्रुतिप्रकाशितार्थविषयं तपोऽन्वारोचयत् अतप्यत। अथ तु एवम् तपस्तप्त्वा प्रकटं ज्ञानमन्वारोच्य सृष्टिसाधनमभूतं मिथुनमुत्पादयते रयिं सोममन्नं, प्राणं अग्निमत्तारम्। एतौ अग्नीषोमौ अभ्यन्नभूतौ मे मम बहुधा अनेकधा प्रजाः करिष्यतः इति एवं सञ्चिन्त्याण्डोत्पत्तिक्रमं सूर्याचन्द्रमसावकल्पयत्॥

 

शंकरभाष्य का हिन्दी अनुवाद

शंकराचार्य कहते हैं

प्रजापति अर्थात् हिरण्यगर्भ, जो समस्त स्थावर-जंगम प्राणियों का अधिपति है, उसने सृष्टि की इच्छा की।

उसने तप किया अर्थात् श्रुति से प्रकाशित सृष्टितत्त्व का चिन्तन किया।

तप के द्वारा सृष्टि के साधनरूप एक मिथुन उत्पन्न हुआ

· रयि जो सोम, अन्न और चन्द्रतत्त्व है। 

· प्राण जो अग्नि, भक्षक और सूर्यतत्त्व है। 

प्रजापति ने विचार किया कि यही अग्नि और सोमरूप द्वैत अनेक प्रकार की प्रजाओं की उत्पत्ति करेगा।

 

दार्शनिक विवेचन

. सृष्टि का मूल इच्छा

उपनिषद् कहता है

सृष्टि कामसे आरम्भ हुई।

यहाँ कामजैविक वासना नहीं; सृजनात्मक चेतना का आवेग है।

बृहदारण्यक उपनिषद् में भी कहा गया

कामयत।

 

. तप और सृष्टि

सृष्टि आकस्मिक नहीं।
उसके पूर्व तप है।

अर्थात्

· चेतना का संकेन्द्रण,

· आन्तरिक ऊष्मा,

· रचनात्मक मौन। 

यह अत्यन्त सूक्ष्म दार्शनिक विचार है।

 

 

. रयि और प्राण : उपनिषदिक द्वैत

यह मंत्र प्रश्नोपनिषद् का केन्द्रीय सिद्धान्त प्रस्तुत करता है।

रयि

प्राण

पदार्थ

चेतना

चन्द्र

सूर्य

अन्न

अग्नि

स्थिरता

गति

रूप

ऊर्जा

समस्त जगत् इन्हीं दोनों की परस्पर क्रिया से निर्मित है।

 

. आधुनिक विज्ञान से साम्य

यदि आधुनिक दृष्टि से देखें, तो

· रयि = matter

· प्राण = energy / life-force

आधुनिक भौतिकी पदार्थ और ऊर्जा की परस्परता की बात करती है।

उपनिषद् इसे प्रतीकात्मक भाषा में कहता है।

 

. अग्नि और सोम

वैदिक चिन्तन में

· अग्नि = सक्रिय ऊर्जा 

· सोम = पोषण, रस, पदार्थ 

प्रश्नोपनिषद् इन्हीं को प्राण और रयि के रूप में पुनः स्थापित करता है।

 

. सृष्टि का जैविक नहीं, आध्यात्मिक अर्थ

यहाँ सृष्टि केवल जैविक reproduction नहीं है।

यह अस्तित्व के प्रत्येक स्तर पर लागू सिद्धान्त है।

हर सृजन पदार्थ और ऊर्जा, रूप और चेतना, स्थिरता और गति  के संयोग से होता है।

अन्य उपनिषदों से साम्य

छान्दोग्य उपनिषद् - एक्षत बहु स्याम्।

तैत्तिरीय उपनिषद् - तपोऽतप्यत।

यहाँ भी सृष्टि से पूर्व तप है।

मुण्डक उपनिषद् - तपसा चीयते ब्रह्म।

 

शोधपूर्ण निबंध

रयि और प्राण : प्रश्नोपनिषद् का ब्रह्माण्डीय सिद्धान्त

प्रश्नोपनिषद् का चतुर्थ मंत्र भारतीय दार्शनिक चिन्तन के अत्यन्त सूक्ष्म सिद्धान्तों में से एक प्रस्तुत करता है रयि और प्राण।

यह सिद्धान्त केवल सृष्टि-विज्ञान नहीं, सम्पूर्ण अस्तित्व की संरचना को समझाने का प्रयास है।

उपनिषद् मानता है कि जगत् का कोई भी रूप केवल पदार्थ से नहीं बनता। यदि केवल रयि हो, तो जड़ता होगी; यदि केवल प्राण हो, तो अभिव्यक्ति नहीं होगी। जीवन इन दोनों की परस्परता है।

यही कारण है कि भारतीय चिन्तन में सूर्य और चन्द्र को मात्र खगोलीय पिण्ड नहीं माना गया। वे अस्तित्व के आध्यात्मिक प्रतीक हैं।

प्रश्नोपनिषद् का यह दृष्टिकोण आधुनिक यांत्रिक विश्वदृष्टि से भिन्न है। आधुनिक विज्ञान जहाँ पदार्थ को मूल मानकर चेतना की व्याख्या करता है, उपनिषद् चेतना को मूल मानकर पदार्थ की व्याख्या करता है।

प्रजाकामका विचार भी अत्यन्त गम्भीर है। यहाँ सृष्टि का मूल इच्छाहै। यह इच्छा स्वयं ब्रह्म की सृजनात्मक शक्ति है।

प्रश्नोपनिषद् का चतुर्थ मंत्र सम्पूर्ण उपनिषद् के सृष्टिदर्शन की आधारशिला है।

यह उद्घाटित करता है कि

· सृष्टि चेतना से उत्पन्न होती है,

· तप उसके पूर्व का आन्तरिक संकेन्द्रण है,

· और रयि-प्राण का द्वैत सम्पूर्ण अस्तित्व की रचनात्मक संरचना है। 

इस प्रकार यह मंत्र भारतीय दर्शन के ब्रह्माण्डीय, आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक चिन्तन का अद्भुत उदाहरण बन जाता है।

 मुकेश ,,,,,,,

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