चुपचाप बैठना और देखना
कभी-कभी
मैं कुछ नहीं करता।
न सोचता हूँ,
न लिखता हूँ,
न किसी को याद करता हूँ।
बस बैठ जाता हूँ।
जैसे कोई पुरानी कुर्सी
कमरे के एक कोने में
सालों से बैठी हो।
तब दुनिया धीरे-धीरे
अपना काम शुरू करती है।
दीवार पर धूप
थोड़ी-सी सरकती है।
घड़ी की टिक-टिक
अचानक सुनाई देने लगती है,
हालाँकि वह पहले भी
उतनी ही आवाज़ कर रही थी।
एक मक्खी
खिड़की के शीशे से टकराती है।
फिर रुक जाती है।
फिर टकराती है।
जैसे उसे विश्वास हो
कि पारदर्शिता ही रास्ता है।
मैं देखता हूँ—
मेज़ पर रखी किताब
बंद है,
लेकिन उसके भीतर
सैकड़ों वाक्य
अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
पानी का गिलास
कुछ नहीं कहता,
फिर भी
उसकी सतह पर तैरती रोशनी
लगातार बदलती रहती है।
धीरे-धीरे
मुझे लगता है
कि चीज़ें
वस्तुएँ नहीं हैं।
वे अपने-अपने जीवन में
व्यस्त प्राणी हैं।
जूते
दरवाज़े की ओर देख रहे हैं।
परदा
हवा का इंतज़ार कर रहा है।
खाली कप
अपने भीतर
किसी पुरानी चाय की गर्मी
संभाले बैठा है।
और तब
अचानक
मुझे पता चलता है
कि देखने वाली चीज़
मैं भी नहीं हूँ।
कमरा मुझे देख रहा है।
धूप मुझे पढ़ रही है।
खिड़की
मेरे चेहरे पर पड़ती छाया से
मेरा हाल जान रही है।
मैं जितना स्थिर होता हूँ,
उतना ही
दुनिया चलने लगती है।
और जितना
दुनिया को चलता देखता हूँ,
उतना ही
अपने भीतर की भीड़
शांत होने लगती है।
फिर एक समय आता है
जब कमरे में
कुछ भी नहीं होता।
सिर्फ़
एक आदमी,
एक कुर्सी,
थोड़ी-सी धूप,
और देखने की घटना।
शायद
जीवन का एक अर्थ
यह भी है—
कि हम कभी-कभी
किसी निष्कर्ष तक पहुँचे बिना,
किसी प्रार्थना के बिना,
किसी उपलब्धि के बिना,
बस
चुपचाप बैठें
और देखें
कि संसार
हमारी अनुपस्थिति में भी
कितनी सुंदरता से
घटित होता रहता है।
मुकेश ,,,,,
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