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Thursday, 14 May 2026

रात जब धीरे-धीरे उतर आती है

 Kolkata की उस बहुमंज़िला इमारत में

रात जब धीरे-धीरे उतर आती है

और अधिकांश खिड़कियाँ

अपनी थकान बंद कर लेती हैं,


वह स्त्री

अक्सर नीचे की वॉकिंग लेन में

धीरे-धीरे चलती रहती है।


पेड़ों की हल्की छाया,

दूर ट्रैफ़िक की थकी हुई आवाज़ें,

और ऊपर

अनगिनत फ्लैटों में जलती बुझती रोशनियाँ

उसे जीवन का कोई गहरा रहस्य लगती हैं।


अब वह चीज़ों को

सिर्फ़ निभाती नहीं,

उन्हें देखती भी है—

एक साक्षी भाव से।


कभी स्वयं को देखती है,

कि कैसे एक शरीर

इतनी भूमिकाएँ निभाता है—

माँ, कर्मचारी, पत्नी, रोग से लड़ती स्त्री।


और कभी संसार को देखती है—

लोग भाग रहे हैं,

कमाते हैं,

झगड़ते हैं,

प्रेम करते हैं,

फिर एक दिन

चुपचाप समय में खो जाते हैं।


चलते-चलते

उसके भीतर प्रश्न उठते हैं—


क्या जीवन

सिर्फ़ ज़िम्मेदारियों का जोड़ है?


क्या आत्मा सचमुच

इन दुखों से परे कोई शांत आकाश है?


पाप और पुण्य

क्या केवल कर्मों में रहते हैं,

या इरादों की छाया में भी?


कर्म क्या है,

अकर्म क्या है,

और कौन है भीतर

जो हर अनुभव को

चुपचाप देखता रहता है?


कभी उसे लगता है

कि परमात्मा

किसी मंदिर में नहीं,

इन्हीं साधारण दिनों के भीतर छिपा है

बच्चों की हँसी में,

बीमारी से लौट आने की जिद में,

और उस मौन में

जहाँ मन अचानक

कुछ देर के लिए शांत हो जाता है।


वह चलती रहती है

उस वॉकिंग लेन पर,

जैसे बाहर नहीं,

अपने ही भीतर

एक लंबी यात्रा कर रही हो।


मुकेश ,,,,,,

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