शाम भीग रही थी।
सड़क पर पीली रोशनियाँ
ऐसे काँप रही थीं
जैसे किसी उदास आदमी की आँखों में
देर तक ठहरा हुआ ख़्वाब।
मैं बहुत देर
बरामदे में बैठा
बारिश को देखता रहा।
अजीब बात है
कुछ मौसम
इंसान के भीतर उतर आते हैं।
आज फिर
तेरी याद
बिना किसी वजह के आ गई।
न कोई ख़त,
न कोई आवाज़,
न कोई निशानी।
सिर्फ़ एक हल्की-सी कमी,
जो अचानक
पूरे कमरे में फैल गई।
मैंने सोचा,
इश्क़ शायद वही है
जो आदमी को
दुनिया के बीच भी
थोड़ा अकेला रखता है।
दूर मस्जिद से
अज़ान की आवाज़ आई।
बारिश धीमी हो चुकी थी।
लेकिन दिल के भीतर
एक पुरानी नमी
अब भी बाकी थी
वैसी ही,
जैसे बरसों बाद भी
किसी किताब में दबा फूल
हल्की-सी ख़ुशबू छोड़ देता है।
मुकेश ,,,,,,,,
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