रात, ख़ुशबू और अधूरी बात
(फ़िराक़ गोरखपुरी की शैली से प्रेरित एक नज़्म)
रात चुप थी,
मगर हवाओं में
तेरी याद की हल्की-सी आहट थी।
जैसे किसी पुराने बाग़ में
देर तक ठहरी हुई
रात-रानी की ख़ुशबू।
मैं बहुत देर
यूँ ही खिड़की पर बैठा रहा।
शहर सो गया था,
लेकिन कुछ रिश्ते
नींद के बाद भी जागते रहते हैं।
तुम्हारा ख़याल
आज फिर
बिना आवाज़ आए कमरे में उतर आया —
धीरे से,
जैसे चाँदनी
पुरानी किताबों पर गिरती है।
मैंने सोचा,
मोहब्बत शायद मिलना नहीं होती,
वह किसी की अनुपस्थिति को
धीरे-धीरे अपने भीतर बसाना होती है।
दूर कहीं
कोई ट्रेन गुज़री।
और उस आवाज़ में
मुझे अपनी उम्र का एक हिस्सा
धीरे-धीरे जाता हुआ लगा।
रात और गहरी हो गई।
मगर तेरी याद —
वह अब भी
हवा में ऐसे तैर रही थी
जैसे कोई अधूरी बात
जिसे समय भी पूरा नहीं कर पाया।
फ़िराक़ गोरखपुरी का संक्षिप्त परिचय
फ़िराक़ गोरखपुरी उर्दू के महान शायरों में गिने जाते हैं। उनका वास्तविक नाम रघुपति सहाय था। उनका जन्म 1896 में गोरखपुर, भारत में हुआ और 1982 में उनका निधन हुआ।
फ़िराक़ की शायरी में प्रेम, अकेलापन, स्मृति, सौंदर्य और मानवीय संवेदनाओं की गहरी अभिव्यक्ति मिलती है। उनकी भाषा अत्यंत कोमल, संगीतात्मक और भावनात्मक गहराई से भरी होती है।
उन्होंने उर्दू ग़ज़ल और नज़्म को आधुनिक संवेदनाओं से जोड़ा। उनकी प्रमुख कृतियों में गुले-नग़्मा, रूह-ए-कायनात और शबनमिस्तान शामिल हैं।
1969 में उन्हें गुले-नग़्मा के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। फ़िराक़ की कविता में प्रेम केवल रोमांटिक अनुभव नहीं, बल्कि जीवन की गहरी उदासी और सौंदर्य का अनुभव बन जाता है।
Mukesh ,,,,,,,,,,,
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