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Sunday, 24 May 2026

बरसाती शाम का संगीत

 बरसाती शाम का संगीत

अब जब उन वर्षों को याद करता हूँ तो लगता है कि सम्पन्न लोगों के घरों में दुख कभी खुलकर दिखाई नहीं देता।
वह पर्दों, रोशनियों, क्रिस्टल के गिलासों और धीमी अंग्रेज़ी संगीत की परतों में छिपा रहता है।

ऊपर से सब कुछ व्यवस्थित दिखाई देता है।
लेकिन भीतर कहीं कोई महीन दरार लगातार बढ़ रही होती है।

उन दिनों मैं तीस के आसपास था।
दिल्ली में नया-नया आया था और कला-समीक्षाओं के छोटे-छोटे लेख लिखता था।
इतनी आय नहीं थी कि उन लोगों की दुनिया का हिस्सा बन सकूँ, लेकिन इतनी थी कि उनके ड्रॉइंगरूम तक पहुँच बना रहे।

वही उम्र जब आदमी खुद को बहुत समझदार मानने लगता है, जबकि भीतर अभी भी असुरक्षाओं का एक काँपता हुआ किशोर बचा रहता है।

उसी दौरान मेरी पहचान उस दम्पति से हुई।

वे लोग शहर के पुराने सम्पन्न परिवारों में गिने जाते थे।
गोल्फ लिंक का बड़ा घर।
दीवारों पर आधुनिक चित्रकारों की पेंटिंग्स।
लकड़ी की लंबी शेल्फ़ों में विदेशी किताबें।
और हर कमरे में एक ऐसी सुव्यवस्थित ख़ामोशी, जिसमें प्रवेश करते ही आदमी अपने जूतों की आवाज़ तक धीमी कर ले।

पुरुष कॉर्पोरेट दुनिया का बड़ा नाम था।
उसकी बातचीत में एक थका हुआ आत्मविश्वास रहता।
जैसे वह वर्षों से लोगों को प्रभावित करते-करते अब खुद अपने प्रभाव से ऊब चुका हो।

स्त्री पियानो बजाती थी।

पहली बार जब मैंने उसे देखा, वह खिड़की के पास बैठी थी।
बारिश हो रही थी और वह बिना किसी श्रोता की परवाह किए बहुत धीरे-धीरे कोई धुन बजा रही थी।

उसके चेहरे पर सौन्दर्य अभी भी था, लेकिन वह उस तरह का सौन्दर्य था जो अपनी चमक से अधिक अपनी थकान के कारण याद रह जाता है।

उसकी उम्र शायद चालीस के आसपास रही होगी।
मुझसे लगभग दस वर्ष बड़ी।

बाद में समझ में आया कि सम्पन्नता मनुष्य को अकेलेपन से नहीं बचाती।
कई बार वह उसे और अधिक निजी और गहरा बना देती है।

मैं वहाँ अक्सर जाने लगा।

शुरू में केवल साहित्य और संगीत की बातें होतीं।
वह रूसी कहानियों के बारे में बात करती।
कहती कि अच्छे लेखक हमेशा मनुष्य के भीतर के अधूरेपन को पहचान लेते हैं।

एक बार उसने अचानक पूछा था—
“क्या आपको नहीं लगता कि उम्र बढ़ने के साथ लोग प्रेम कम और आदत ज़्यादा हो जाते हैं?”

मैं उस समय इस प्रश्न का अर्थ पूरी तरह नहीं समझ पाया था।

उसका पति अक्सर यात्राओं पर रहता।
और जब घर में होता भी, तो दोनों के बीच एक विनम्र दूरी बनी रहती।

वे झगड़ते नहीं थे।
उच्चवर्गीय विवाहों में अक्सर झगड़े भी सभ्य हो जाते हैं।

केवल कुछ चुप्पियाँ होती हैं।
कुछ आधे वाक्य।
कुछ ऐसी निगाहें जिनमें पुराने हिसाब जमा रहते हैं।

धीरे-धीरे मैंने नोटिस किया कि वह शराब बहुत कम पीती थी, लेकिन गिलास हमेशा हाथ में रखती थी।
जैसे किसी वस्तु को पकड़े रहने से भीतर का खालीपन थोड़ा स्थिर रहता हो।

एक शाम उसने मुझे अपने संगीत-कक्ष में बुलाया।

बाहर लगातार बारिश हो रही थी।
घर में बाकी लोग नहीं थे।
केवल दूर कहीं एयर-कंडीशनर की धीमी आवाज़ थी।

वह पियानो के सामने बैठी थी, लेकिन बजा नहीं रही थी।

कमरे में केवल पीली रोशनी थी।

उसने पूछा—
“क्या आपको कभी ऐसा लगता है कि कुछ लोग अचानक आपकी ज़िंदगी में बहुत देर से आते हैं?”

उस समय तक मैं उसके प्रति एक अस्पष्ट आकर्षण महसूस करने लगा था।
लेकिन वह आकर्षण शरीर से ज़्यादा उसके भीतर की उदासी के प्रति था।

कुछ लोग सुंदर होने से अधिक दुखी होने के कारण आकर्षित करते हैं।

मैंने कोई उत्तर नहीं दिया।

वह मुस्कुराई।
लेकिन वह मुस्कान पूरी नहीं थी।

फिर उसने बहुत धीरे से कहा—
“कभी-कभी मुझे डर लगता है कि मैं धीरे-धीरे अपने ही जीवन से बाहर होती जा रही हूँ।”

उस क्षण पहली बार मुझे उसकी उम्र दिखाई दी।

आँखों के किनारों की महीन रेखाएँ।
उँगलियों की थकान।
और वह भय जिसे सम्पन्न लोग सबसे अधिक छिपाते हैं — अप्रासंगिक हो जाने का भय।

बाहर बारिश और तेज़ हो गई थी।

कुछ देर बाद बिजली चली गई।

पूरा कमरा अँधेरे में डूब गया।

सिर्फ़ खिड़की से आती हल्की बारिश की गंध बची रही।

फिर मुझे महसूस हुआ कि वह बिल्कुल स्थिर खड़ी है।

इतनी स्थिर कि उसकी साँसों की आवाज़ सुनाई देने लगी।

अँधेरे में मनुष्य का शरीर अचानक बहुत सच्चा हो जाता है।

उसने धीरे से मेरा हाथ पकड़ लिया।

बस हाथ।

उस पकड़ में कोई उत्तेजना नहीं थी।
बल्कि एक गहरी थकान थी।

जैसे कोई बहुत दूर तक तैरने के बाद कुछ देर किनारे को छू लेना चाहता हो।

हम दोनों वैसे ही खड़े रहे।

कितनी देर — यह आज भी याद नहीं।

फिर अचानक ऊपर जेनरेटर चलने की आवाज़ आई।
रोशनी लौट आई।

उसने तुरंत हाथ छोड़ दिया।

और बिल्कुल सामान्य स्वर में पूछा—
“कॉफ़ी लेंगे?”

मैंने पहली बार समझा कि मनुष्य अपने सबसे निर्णायक क्षणों के तुरंत बाद भी कितनी सहज बातें कर सकता है।

उस रात मैं घर लौट आया।

लेकिन उसके बाद हमारे बीच कुछ बदल गया।

अब वह पहले की तरह खुलकर बातें नहीं करती थी।
मुस्कानें अधिक औपचारिक हो गईं।

कई बार मुझे लगता वह जानबूझकर दूरी बना रही है।
और कई बार लगता शायद यह सब मैंने ही कल्पना किया था।

कुछ महीनों बाद सुना कि उसका पति विदेश चला गया है।
फिर किसी ने कहा वे अलग रह रहे हैं।
फिर किसी ने कहा सब ठीक हो गया।

उच्चवर्गीय जीवन में सच कभी साफ़ दिखाई नहीं देता।
वह अफ़वाहों, पार्टियों और तस्वीरों के बीच धुँधला पड़ा रहता है।

मैं भी धीरे-धीरे अपने कामों में उलझ गया।

सालों बाद एक संगीत-समारोह में वह फिर दिखाई दी।

बहुत सलीके से तैयार।
बाल छोटे हो चुके थे।
चेहरे पर वही नियंत्रित शिष्टता।

उसने मुझे देखा।
हल्का-सा मुस्कुराई।

जैसे हम दोनों किसी ऐसे रहस्य को याद कर रहे हों जिसका नाम लेना अब संभव नहीं।

फिर वह लोगों के बीच खो गई।

आज भी कभी बारिश की रात में दूर कहीं पियानो सुनाई देता है तो वह शाम याद आ जाती है।

अब सोचता हूँ —
शायद वह मुझसे प्रेम नहीं करती थी।

शायद वह केवल यह जानना चाहती थी कि उसके भीतर अभी भी किसी को छू लेने की इच्छा बची हुई है या नहीं।

और शायद मैं भी उससे प्रेम नहीं करता था।

मैं केवल पहली बार किसी परिपक्व अकेलेपन के इतने पास खड़ा था।

कुछ अकेलेपन उम्र के साथ और सुंदर हो जाते हैं।

और शायद अधिक खतरनाक भी।


मुकेश ,,,,,,,

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