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Thursday, 14 May 2026

रात देर तक एक कमरे की बत्ती जलती रहती है।

 Kolkata की उस बहुमंज़िला इमारत में

रात देर तक

एक कमरे की बत्ती जलती रहती है।


वह स्त्री

अब भी लैपटॉप पर झुकी है,

हालाँकि दफ़्तर का समय

कब का समाप्त हो चुका।


घर की पूरी गृहस्थी

धीरे-धीरे

उसके कंधों पर आकर टिक गई है।


उसका पति

चुप रहने वाला आदमी है—

हर कुछ महीनों में

नौकरी बदल देता है,

जैसे किसी शहर में

कभी अपना घर न बना पाया हो।


वह बड़े सपने तो बोलता है,

पर गैस का बिल,

बच्चों की फ़ीस,

या महीने के राशन की चिंता

अक्सर उसी स्त्री की डायरी में दर्ज होती है।


महँगाई

दरवाज़े पर खड़ी रहती है

एक अदृश्य वसूली करने वाले की तरह।


दूध महँगा,

स्कूल महँगा,

दवाइयाँ महँगी,

और समय

सबसे ज़्यादा महँगा।


बच्चे

अब भी छोटी-छोटी बातों पर

उसके पास भागकर आते हैं,

और वह

अपनी थकान छिपाकर

हर बार मुस्कुरा देती है।


कभी-कभी रात में

वह बालकनी में खड़ी होकर

नीचे शहर को देखती है

इतनी रोशनियाँ,

इतनी भागती ज़िंदगियाँ,

और हर खिड़की में

शायद कोई न कोई

अपनी चुप लड़ाई लड़ रहा है।


उसके भीतर भी

एक समुद्र है

थका हुआ,

लेकिन डूबा नहीं।


क्योंकि उसे मालूम है,

अगर वह टूट गई

तो इस घर की दीवारों में

दरारें सुनाई देने लगेंगी।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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