आख़िरी दरवाज़ा
आख़िर में
जब सारे दरवाज़े देख लिए जाते हैं
बंद, खुले, जंग लगे,
भीतर से बंद,
और वे भी
जो सिर्फ़ भीतर खुलते हैं
तब एक दरवाज़ा बचता है।
वह किसी दीवार पर नहीं होता,
न किसी घर में,
न किसी स्मृति में पूरी तरह
वह बस होता है,
जैसे अंतिम प्रश्न
जिसका उत्तर टलता रहा हो।
उसके सामने
कोई दस्तक नहीं दी जाती,
कोई आवाज़ नहीं लगाई जाती
क्योंकि यहाँ
कोई “दूसरा” नहीं होता।
मैं उसके पास गया
न डर था, न उत्सुकता,
बस एक अजीब-सी स्वीकृति,
जैसे लंबी यात्रा के बाद
पैर खुद रुक जाएँ।
वह दरवाज़ा
न पूरी तरह बंद था,
न खुला
बस प्रतीक्षा में था,
या शायद
मैं ही प्रतीक्षा में था।
कहते हैं,
आख़िरी दरवाज़ा
खोला नहीं जाता
उसमें प्रवेश किया जाता है।
और जब मैंने
अपना हाथ बढ़ाया,
तो पाया
कि वहाँ कोई हैंडल नहीं था
सिर्फ़ एक हल्की-सी पारदर्शिता,
जैसे दरवाज़ा नहीं,
एक सीमा हो।
मैंने उसे धकेला नहीं
बस आगे बढ़ा,
और वह अपने-आप
मुझमें से गुजर गया।
उसके पार
कुछ भी नहीं था
जिसे शब्दों में रखा जा सके
न कोई कमरा,
न कोई रोशनी,
न अँधेरा भी।
बस एक ऐसा होना
जहाँ “मैं”
धीरे-धीरे
अपनी पकड़ ढीली करता है।
और तभी समझ में आता है
आख़िरी दरवाज़ा
किसी जगह का नहीं,
एक अवस्था का नाम है।
जहाँ पहुँचकर
दरवाज़े भी समाप्त हो जाते हैं,
और यात्राएँ भी।
शायद
यही वह क्षण है
जहाँ
खोलने वाला,
दरवाज़ा,
और पार जाने वाला
तीनों
एक ही हो जाते हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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