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Friday, 1 May 2026

“दरवाज़े” — एक काव्य-चक्र की प्रस्तावना

 “दरवाज़े” — एक काव्य-चक्र की प्रस्तावना

मनुष्य का जीवन
शायद दरवाज़ों की एक लंबी श्रृंखला है
जहाँ हर मोड़ पर
कुछ खुलता है,
कुछ बंद होता है,
और कुछ ऐसा भी होता है
जिसके होने का अहसास तो है,
पर जिसे कभी छुआ नहीं गया।

“दरवाज़े” केवल स्थापत्य का हिस्सा नहीं,
वे मनोभूमि के प्रतीक हैं
सीमाओं और संभावनाओं के बीच खिंची हुई
एक अदृश्य रेखा,
जहाँ निर्णय जन्म लेते हैं
और संकोच अपना घर बनाते हैं।

इस काव्य-श्रृंखला में
दरवाज़े वस्तु नहीं, अनुभव हैं
कभी जंग लगे हुए,
कभी भीतर से बंद,
कभी बिना कुंडी के खुले,
तो कभी ऐसे
जो कभी खुलते ही नहीं।

हर दरवाज़ा
एक अलग मनःस्थिति का रूपक है
भय, स्मृति, विश्वास, थकान,
आकांक्षा और अंततः
आत्मबोध का।

यह श्रृंखला
बाहर की दुनिया से भीतर की यात्रा है
एक क्रमिक अवतरण,
जहाँ आरंभ में हम
दीवारों और कुंडियों को देखते हैं,
पर अंत तक पहुँचते-पहुँचते
समझ जाते हैं
कि असली दरवाज़े
कहीं और हैं।

यहाँ
खोलना केवल एक क्रिया नहीं,
एक स्वीकृति है—
और बंद होना
सिर्फ़ रुकना नहीं,
कभी-कभी स्वयं को बचा लेना भी।

“आख़िरी दरवाज़ा”
इस यात्रा का अंत नहीं,
उस बिंदु का संकेत है
जहाँ दरवाज़ों की आवश्यकता ही समाप्त हो जाती है
जहाँ विभाजन मिटते हैं,
और अनुभव एकरूप हो जाता है।

इस काव्य-चक्र को पढ़ते हुए
पाठक से अपेक्षा नहीं कि वह
हर दरवाज़े को खोले
बल्कि यह कि वह
उनके सामने ठहरे,
उनकी सतह को छुए,
और यह महसूस करे
कि कौन-सा दरवाज़ा
उसके भीतर पहले से मौजूद है।

क्योंकि अंततः
हर दरवाज़ा बाहर नहीं होता,
और हर यात्रा
कहीं जाने के लिए नहीं होती।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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