वह स्त्री जो अपने ही बनाए हुए व्यक्तित्व का भार उठाते-उठाते थक गई थी
अब उसकी उम्र उस मोड़ पर पहुँच चुकी है जहाँ मनुष्य अपने चेहरे से अधिक अपनी थकान से पहचाना जाने लगता है।
उसके भीतर अब भी वही शिष्टता है, वही संयत हास्य, वही व्यवस्थित जीवन-शैली।
वह अब भी सांस्कृतिक कार्यक्रमों में दिखाई दे जाती है।
अब भी महँगा reading glass लगाकर गम्भीर किताबें पढ़ती है।
अब भी लोगों से इतनी सन्तुलित भाषा में बात करती है कि सामने वाला प्रभावित हुए बिना नहीं रहता।
लेकिन अब उसके व्यक्तित्व पर एक हल्की थकान स्थायी रूप से जम गई है।
और शायद सबसे अधिक वह उसकी बीमारियों में दिखाई देती है।
वह अक्सर migraine की शिकायत करती है।
कभी कमर का दर्द।
कभी पैरों में भारीपन।
कभी सर्वाइकल।
कभी थकान जो किसी जाँच में ठीक से पकड़ में नहीं आती।
उसने बहुत इलाज कराए हैं।
अलग-अलग डॉक्टर।
फिजियोथेरेपी।
योग।
ध्यान।
विटामिन।
आयुर्वेद।
कभी-कभी ज्योतिषीय उपाय भी।
लेकिन बीमारी पूरी तरह कभी जाती नहीं।
पहले मुझे लगता था, शायद यह सामान्य उम्रजनित शारीरिक समस्या होगी।
लेकिन वर्षों उसे देखने के बाद धीरे-धीरे मुझे लगने लगा कि उसके शरीर के भीतर केवल बीमारी नहीं, एक गहरा अन्तर्द्वन्द्व भी रहता है।
वह जीवन से बहुत कुछ एक साथ चाहती थी।
नाम भी।
आर्थिक सुरक्षा भी।
स्वतन्त्रता भी।
बौद्धिक पहचान भी।
भावनात्मक विशिष्टता भी।
और ऐसा प्रेम भी जिसमें उसे कभी समझौता न करना पड़े।
समस्या यह नहीं थी कि उसकी इच्छाएँ बड़ी थीं।
समस्या यह थी कि वे इच्छाएँ अक्सर एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ी हो जाती थीं।
वह स्वतन्त्र भी रहना चाहती थी और किसी के लिए अद्वितीय भी बनना चाहती थी।
वह सम्बन्ध भी चाहती थी और उत्तरदायित्व से घबराती भी थी।
वह आध्यात्मिक दिखाई देना चाहती थी, लेकिन संसार की प्रशंसा और प्रभाव से पूरी तरह मुक्त भी नहीं हो पाती थी।
वह refined जीवन चाहती थी, लेकिन भीतर की असुरक्षाएँ बार-बार उसे साधारण मानवीय प्रतिक्रियाओं तक ले आती थीं।
यही विरोधाभास धीरे-धीरे उसके व्यक्तित्व का स्थायी हिस्सा बन गए।
कई बार जब वह migraine की शिकायत करती, मुझे लगता उसका सिर केवल दर्द नहीं कर रहा — वह लगातार अपने ही भीतर चल रही बहसों का भार उठा रहा है।
एक बार शाम को मैं उसके घर गया।
वह कमरे की हल्की रोशनी में बैठी थी। पर्दे खींचे हुए थे। उसने माथे पर हाथ रखा हुआ था।
“फिर दर्द?” मैंने पूछा।
वह हल्का मुस्कुराई।
“अब तो यही साथी है।”
उसकी आवाज़ में मज़ाक था, लेकिन थकान उससे गहरी थी।
कुछ देर बाद वह अचानक बोली —
“तुम्हें नहीं लगता… आदमी जीवन में बहुत कुछ चाहता है और अन्त में कुछ भी पूरा नहीं मिलता?”
उस समय वह कहीं दूर देख रही थी।
मुझे लगा, यह वाक्य केवल विचार नहीं था। वह अपने ही जीवन का संक्षेप बोल रही थी।
अब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो वह मुझे किसी असफल स्त्री की तरह नहीं लगती।
दुनिया की दृष्टि से उसने बहुत कुछ पाया।
सम्मान।
पहचान।
सामाजिक सक्रियता।
बौद्धिक छवि।
लोगों का आकर्षण।
लेकिन मनोविज्ञान के स्तर पर उसका व्यक्तित्व कई विरोधी परतों से बना था।
वह समझदार थी — पर पूरी तरह आत्मदर्शी नहीं।
संस्कारी थी — पर भीतर दबा आक्रोश भी था।
संवेदनशील थी — पर सम्बन्धों को नियंत्रित भी करती थी।
स्वतन्त्र थी — पर भावनात्मक स्वीकृति की भूखी भी।
आध्यात्मिक दिखना चाहती थी — पर भीतर से अभी भी मानवीय असुरक्षाओं से बँधी हुई।
शायद इसी कारण उसके भीतर कभी स्थायी शान्ति नहीं बन पाई।
मनोविज्ञान की भाषा में देखें, तो उसके व्यक्तित्व में हल्का narcissistic idealization, emotional ambivalence और chronic dissatisfaction साथ-साथ चलते दिखाई देते थे।
वह स्वयं को एक विशेष, refined, गहरी स्त्री के रूप में देखना चाहती थी। और यह पूरी तरह भ्रम भी नहीं था — वह सचमुच औसत से ऊपर की बुद्धि और संवेदनशीलता रखती थी।
लेकिन उसके भीतर का वास्तविक, असुरक्षित, अपूर्ण मनुष्य उस आदर्श छवि से लगातार मेल नहीं खा पाता था।
यही अन्तर धीरे-धीरे तनाव बन गया।
और कई बार शरीर उन संघर्षों को व्यक्त करने लगता है जिन्हें मन स्वीकार नहीं करना चाहता।
शायद उसके migraine, उसके दर्द, उसकी थकान — सब केवल शारीरिक नहीं थे।
वे उस अदृश्य जीवन-भार के लक्षण थे जिसे वह वर्षों से बहुत सलीके, बहुत शिष्टता और बहुत अकेलेपन के साथ उठाती रही थी।
मुकेश ,,,,,,,,,
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