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Thursday, 28 May 2026

धूप से गुफ़्तगू — और बूढ़ा बरामदा

 धूप से गुफ़्तगू — और बूढ़ा बरामदा


घर का वह बरामदा

अब बूढ़ा हो चला है।


उसकी दीवारों से

चूने की परतें ऐसे उतरती हैं

जैसे किसी वृद्ध के हाथों से

धीरे-धीरे स्मृतियाँ झरती हों।


मैं वहीं बैठा था

जब धूप आई।


वह पहले

बरामदे की टूटी मोज़ेक पर फैली,

फिर धीरे से

पुरानी बेंत की कुर्सी पर जा बैठी —

ठीक वहाँ

जहाँ कभी अब्बा शाम को अख़बार पढ़ा करते थे।


कुछ देर

हम दोनों चुप रहे।


बरामदे में

हल्दी, पुरानी लकड़ी

और बरसों से रखे लोहे की मिली-जुली गंध थी।


मैंने धूप से पूछा 


“क्या जगहें भी बूढ़ी होती हैं?”


धूप ने

दीवार पर टंगी धुँधली तस्वीर को छुआ

और मुस्कुराई।


“जगहें बूढ़ी नहीं होतीं,”

वह बोली,

“वे बस

अपने भीतर जमा आवाज़ों से भर जाती हैं।”


तभी हवा चली।

बरामदे का पुराना पंखा

हल्का-सा काँपा,

जैसे नींद में किसी ने उसका नाम लिया हो।


धूप ने कहा 


“देखो इस बरामदे को।

यह सिर्फ़ ईंट और लकड़ी नहीं।

यह उन लोगों की प्रतीक्षा है

जो यहाँ बैठकर

कभी लौट आने वालों का इंतज़ार करते थे।”


मैंने फ़र्श पर

धूप के छोटे-छोटे टुकड़े देखे।

वे ऐसे बिखरे थे

जैसे किसी बुज़ुर्ग की जेब से

पुराने सिक्के गिर पड़े हों।


मैंने धीरे से पूछा 

“और जो लोग लौटकर नहीं आते?”


धूप कुछ देर

खाली कुर्सी पर ठहरी रही।


फिर बोली 


“बरामदे उन्हें भूलते नहीं।


वे उनकी हँसी

दीवारों में टाँग लेते हैं,

उनकी आदतें

दरवाज़ों में छुपा देते हैं।


इसलिए पुराने घरों में

अचानक कभी-कभी

बिना वजह

अपनापन महसूस होता है।”


शाम उतरने लगी थी।

धूप धीरे-धीरे

बरामदे से खिसक रही थी।


जाते-जाते उसने कहा 


“कुछ जगहें

मकान नहीं होतीं।


वे समय के थके हुए कंधे होती हैं,

जहाँ बीती हुई ज़िंदगियाँ

थोड़ी देर बैठकर

अब भी साँस लेती हैं।”


मुकेश ,,,,,,

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