धूप से गुफ़्तगू — पहाड़

 धूप से गुफ़्तगू — पहाड़ से


मैं उस दिन

बहुत देर तक पहाड़ को देखता रहा।


वह चुप था।

इतना चुप

कि उसकी ख़ामोशी में

दूर उड़ते परिंदों की थकान तक सुनाई दे रही थी।


धूप धीरे-धीरे

उसकी चोटियों पर उतर रही थी,

जैसे कोई माँ

सोते हुए बच्चे के बाल सहला रही हो।


मैंने धूप से पूछा 


“तुम हर रोज़

इतनी दूर से आती हो,

फिर भी पहाड़

तुम्हारे लिए कभी बदलता नहीं।

तुम्हें बुरा नहीं लगता?”


धूप मुस्कुराई।


वह बर्फ़ पर चमकी,

और पूरी घाटी

कुछ पल के लिए

इबादत-सी लगने लगी।


फिर वह बोली 


“जो सचमुच ऊँचे होते हैं,

वे कम बोलते हैं।


पहाड़ अपनी मोहब्बत

चिल्लाकर नहीं जताते।

वे बस

तुम्हारे भीतर की आवाज़ें धीमी कर देते हैं।”


मैं चुप रहा।


नीचे कहीं

झरना बह रहा था।

उसकी आवाज़

ऐसी थी

जैसे पत्थर भी कभी-कभी

रो लेते हों।


मैंने पूछा 

“और यह अकेलापन?”


धूप ने

एक देवदार की शाख पर ठहरते हुए कहा 


“पहाड़ अकेले नहीं होते।

वे बादलों, हवाओं, परिंदों

और रास्ता भटक चुके लोगों के दोस्त होते हैं।


अकेला तो इंसान होता है

जो भीड़ में भी

अपनी ही आवाज़ से दूर रहता है।”


फिर उसने

मेरे कंधों पर थोड़ी गरमी रख दी।


अचानक लगा

जैसे भीतर जमी हुई बर्फ़

धीरे-धीरे पिघल रही हो।


मैंने पहाड़ की तरफ़ देखा।


वह अब भी वैसा ही था 

स्थिर, विशाल, निर्विकार।


मगर पहली बार

मुझे उसकी चुप्पी में

घमंड नहीं,

सबर दिखाई दिया।


धूप ने जाते-जाते कहा 


“ऊँचा होना

आसमान के क़रीब होना नहीं है।


ऊँचा वह है

जो तूफ़ानों के बीच भी

अपनी जगह से न हिले,

और फिर भी

अपने भीतर बर्फ़ बचाए रखे।”


मुकेश ,,,,,,

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