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Saturday, 9 May 2026

पत्थर हो रहे हैं

 पत्थर हो रहे हैं

मिरे अंदर कई एहसास पत्थर हो रहे हैं,

तेरी ख़ामोशियों के वार ख़ंजर हो रहे हैं।

पहले ऐसा नहीं था

मैं छोटी-सी बात पर भी

भीग जाया करता था,

किसी की आवाज़ में छुपी उदासी

मुझे देर तक सोने नहीं देती थी।

मगर अब…

जैसे भीतर कोई दरिया

धीरे-धीरे सूख रहा है।

मैं मुस्कुराता हूँ,

लोग कहते हैं

“देखो, कितना मज़बूत आदमी है।”

उन्हें क्या मालूम

मज़बूत दिखने की कोशिश में

कितना कुछ मर जाता है।

मिरे अंदर कई एहसास पत्थर हो रहे हैं…

अब कोई बात

सीधे दिल तक नहीं पहुँचती,

हर जुमला

किसी बंद दरवाज़े से लौट आता है।


तुम्हारी चुप्पियाँ

हाँ, वही चुप्पियाँ

जो कभी मुझे सुकून देती थीं

अब मेरे अंदर

धीरे-धीरे ख़ंजर हो रही हैं।


मैंने कई बार चाहा

कि सब कुछ तोड़ दूँ—

ये दूरी, ये अहंकार,

ये अनकहा प्रेम

मगर हर बार

मेरे हाथों में

सिर्फ़ ख़ामोशी बची।


अजीब बात है

इंसान मरता नहीं हमेशा,

कभी-कभी

वो बस महसूस करना छोड़ देता है।

और शायद

यही सबसे ख़तरनाक मौत होती है।

मिरे अंदर कई एहसास पत्थर हो रहे हैं,

तेरी ख़ामोशियों के वार ख़ंजर हो रहे हैं।

अब आईना भी

मुझे पहले जैसा नहीं पहचानता।

मुकेश ,,,,,,,,,,,


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