प्रश्नोपनिषद् — प्रथम प्रश्न — षष्ठ मंत्र
आदित्य, प्राण और समस्त दिशाओं में व्याप्त चेतना का उपनिषदिक दर्शन
मंत्र का मूल संस्कृत पाठ
अथादित्य उदयन् यत्प्राचीं दिशं प्रविशति तेन प्राच्यान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ।
यद्दक्षिणां यत्प्रतीचीं यदुदीचीं यदधो यदूर्ध्वं यदन्तरा दिशः ।
यत्सर्वं प्रकाशयति तेन सर्वान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ॥६॥
मंत्र का हिन्दी अनुवाद
जब सूर्य उदित होकर पूर्व दिशा में प्रवेश करता है, तब वह अपनी किरणों में पूर्व दिशा के समस्त प्राणों को धारण कर लेता है।
इसी प्रकार जब वह दक्षिण, पश्चिम, उत्तर, अधः, ऊर्ध्व तथा अन्तरदिशाओं में प्रकाश फैलाता है, तब वह उन सभी दिशाओं के प्राणों को अपनी किरणों में धारण करता है।
भावार्थ
यह मंत्र सूर्य को केवल भौतिक प्रकाशदाता नहीं मानता। यहाँ सूर्य “सार्वभौम प्राण” का प्रतीक है।
सूर्य जहाँ-जहाँ प्रकाश फैलाता है, वहाँ-वहाँ जीवन जाग्रत हो उठता है। अर्थात् — चेतना की उपस्थिति से ही जगत् प्रकाशित और सक्रिय होता है।
अन्वय
अथ आदित्यः उदयन् यत् प्राचीं दिशं प्रविशति, तेन प्राच्यान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते।
यत् दक्षिणाम्, यत् प्रतीचीम्, यत् उदीचीम्, यत् अधः, यत् ऊर्ध्वम्, यत् अन्तराः दिशः — यत् सर्वं प्रकाशयति, तेन सर्वान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते।
संधि-विच्छेद
संधियुक्त पद | विच्छेद | संधि प्रकार |
अथादित्यः | अथ + आदित्यः | स्वर संधि |
उदयन् | उद् + अयन् | उपसर्ग |
यत्प्राचीं | यत् + प्राचीम् | व्यंजन संधि |
प्राणान् रश्मिषु | प्राणान् + रश्मिषु | व्यंजन संधि |
संनिधत्ते | सम् + नि + धा | धातुरूप |
यद्दक्षिणाम् | यत् + दक्षिणाम् | व्यंजन संधि |
यदूर्ध्वम् | यत् + ऊर्ध्वम् | स्वर संधि |
प्रकाशयति | प्र + काश् | धातु प्रयोग |
शब्दार्थ एवं व्याकरणिक विश्लेषण
१. आदित्यः
· सूर्य।
· यहाँ विश्वप्राण का प्रतीक।
२. उदयन्
धातु — “इ” (गमन)
उदयमान।
अर्थ —
प्रकाशमान होकर उदित होना।
३. प्राणान्
· जीवनशक्तियाँ।
· यहाँ समस्त जीवधारियों की जीवनचेतना।
४. रश्मिषु
· किरणों में।
· “रश्मि” = प्रकाशरेखा।
५. संनिधत्ते
धातु — “धा”
उपसर्ग — सम् + नि
अर्थ —
धारण करता है, स्थित करता है।
आदि शंकराचार्य भाष्य (मूल संस्कृत)
अथ आदित्यः उदयन् उद्रच्छन् प्राणिनां चक्षुरगोचरम् आगच्छन् यां प्राचीं दिशं स्वप्रकाशेन भासयति व्याप्नोति, तेन स्वात्मव्याप्त्या सर्वान् स्थानप्राणान् तस्मिन् दिशि स्वात्मावभासरूपेषु रश्मिषु व्याप्निमतः व्याप्त्वा आलम्बमानः संनिधत्ते, संनिवेशयति, आत्मभूतान् करोतीत्यर्थः। तथा एव यत् प्रविशति दक्षिणां, यत् प्रतीचीं, यदुदीचीम्, यदधः, यदूर्ध्वम्, यदन्तरा दिशः कोणदिशः अवान्तरदिशः, यच्च अन्यत् सर्वं प्रकाशयति, तेन स्वप्रकाशव्याप्त्या सर्वान् सर्वदिक्स्थान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते॥
शंकरभाष्य का हिन्दी अनुवाद
शंकराचार्य कहते हैं —
जब सूर्य उदित होकर दृश्य होता है और अपनी ज्योति से पूर्व दिशा को प्रकाशित करता है, तब वह वहाँ स्थित समस्त प्राणियों को अपनी किरणों के माध्यम से व्याप्त कर लेता है।
अर्थात् सूर्य अपनी चेतनामयी शक्ति से सबको जीवन देता है।
इसी प्रकार दक्षिण, पश्चिम, उत्तर, अधः, ऊर्ध्व तथा सभी कोणीय दिशाओं में भी वह अपनी प्रकाशशक्ति से समस्त प्राणों को धारण करता है।
यहाँ “रश्मि” केवल भौतिक किरण नहीं, प्राणशक्ति का प्रतीक है।
दार्शनिक विवेचन
१. सूर्य : दृश्य ब्रह्म
वैदिक और उपनिषदिक परम्परा में सूर्य केवल खगोलीय पिण्ड नहीं।
वह — प्रत्यक्ष देवता, चेतना, प्राण, और ब्रह्म का दृश्य प्रतीक है।
ऋग्वेद कहता है — “सूर्यो आत्मा जगतस्तस्थुषश्च।”
२. प्रकाश और चेतना
उपनिषद् बार-बार “प्रकाश” को चेतना का प्रतीक बनाते हैं।
सूर्य बाहर का अन्धकार मिटाता है। आत्मा भीतर का।
३. रश्मि का प्रतीक
रश्मियाँ यहाँ केवल photons नहीं हैं। वे चेतना के प्रसरण का प्रतीक हैं।
जैसे सूर्य की किरणें पृथ्वी पर जीवन जगाती हैं, वैसे ही आत्मचेतना सम्पूर्ण अनुभवजगत् को प्रकाशित करती है।
४. सर्वदिक्-व्याप्ति
मंत्र में दिशाओं की पुनरावृत्ति अत्यन्त अर्थपूर्ण है।
· पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, अधः, ऊर्ध्व, अन्तरदिशाएँ — सबका उल्लेख यह दिखाता है कि प्राण सार्वभौम है।
५. अद्वैत की अन्तर्धारा
यद्यपि यहाँ सूर्य और प्राण का प्रतीकात्मक सम्बन्ध है, किन्तु शंकराचार्य इसे आत्मव्याप्ति के रूप में देखते हैं।
अर्थात् —चेतना समस्त अस्तित्व में व्याप्त है।
६. आधुनिक दृष्टि से
यदि आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से देखें —
· पृथ्वी पर समस्त जैविक ऊर्जा का मूल स्रोत सूर्य है।
· प्रकाश के बिना जीवन असम्भव है।
उपनिषद् इसी तथ्य को आध्यात्मिक प्रतीकवाद में व्यक्त करता है।
अन्य उपनिषदों से साम्य
कठोपनिषद् “न तत्र सूर्यो भाति…”- यहाँ आत्मा को सूर्य से भी परे प्रकाश कहा गया है।
मुण्डक उपनिषद् -: “तस्य भासा सर्वमिदं विभाति।”
छान्दोग्य उपनिषद् : छान्दोग्य उपनिषद् में सूर्य को प्राण और उद्गीथ का प्रतीक माना गया है।
शोधपूर्ण निबंध
सूर्य और प्राण : उपनिषदों का चेतनामूलक ब्रह्माण्ड-दर्शन
प्रश्नोपनिषद् का षष्ठ मंत्र भारतीय चिन्तन की उस महान परम्परा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें प्रकृति के दृश्यमान तत्त्वों को आध्यात्मिक प्रतीकों के रूप में देखा गया।
सूर्य केवल प्रकाश नहीं; जीवन की धड़कन है। आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि पृथ्वी पर समस्त जैविक ऊर्जा सूर्य से आती है। उपनिषद् इस वैज्ञानिक तथ्य को आध्यात्मिक अनुभूति में रूपान्तरित कर देता है।
यहाँ “रश्मि” अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रतीक है। रश्मियाँ जीवन का प्रसार करती हैं। उसी प्रकार चेतना अनुभव का प्रसार करती है।
मंत्र यह भी संकेत करता है कि जीवन पृथक-पृथक इकाइयों का समूह नहीं, बल्कि एक वैश्विक प्राण-संरचना है।
यह दृष्टि आधुनिक यांत्रिक व्यक्तिवाद से भिन्न है। उपनिषद् के अनुसार सम्पूर्ण जीवन एक ही प्राण के विविध स्पन्दन हैं।
प्रश्नोपनिषद् का षष्ठ मंत्र सूर्य और प्राण के माध्यम से सार्वभौम चेतना की अवधारणा को उद्घाटित करता है।
यह मंत्र बताता है कि —
· प्रकाश जीवन का आधार है,
· चेतना सर्वव्यापी है,
· और समस्त दिशाओं में एक ही प्राण व्याप्त है।
इस प्रकार यह मंत्र उपनिषदों की उस दिव्य दृष्टि का परिचायक बनता है जिसमें प्रकृति, चेतना और ब्रह्म एक ही विराट सत्य के विविध आयाम बन जाते हैं।
मुकेश ,,,,,,,
No comments:
Post a Comment