Kolkata की उस बहुमंज़िला इमारत वाली लड़की
अब अपने पति से
न कोई बड़ी उम्मीद रखती है,
न कोई ख़्वाहिश।
बस कभी-कभी
मन के बहुत भीतर
एक छोटी-सी इच्छा जागती है
कि किसी रोज़
वह आदमी
चुपचाप पीछे से आकर
उसे बाँहों में भर ले
और धीमे से पूछे
“क्यों उदास हो?”
और तब
वह सारी थकान,
सारी शिकायतें,
सारे हिसाब भूलकर
बस उससे लिपट जाए
जैसे वर्षों बाद
कोई घर लौटा हो।
लेकिन फिर
वह अचानक सोचने लगती है
क्या यह वही आदमी है
जो शादी से पहले
हर सुबह
उसके दरवाज़े पर
चुपके से फूलों का एक गuldasta रख जाता था?
ताकि जब वह बाहर निकले
तो मुस्कुराते, महकते फूल
सबसे पहले उसका स्वागत करें।
वही आदमी
जो उसकी एक मुस्कान के लिए
पूरी शाम इंतज़ार कर सकता था।
और आज
उसे यह भी याद नहीं रहता
कि उसके भीतर रखा
असल वाला गुलदस्ता
कितना सूख गया है।
वह लड़की
कभी-कभी सोचती है,
प्रेम शायद
अचानक ख़त्म नहीं होता,
बस धीरे-धीरे
ज़िम्मेदारियों,
चुप्पियों,
थकानों
और अधूरी बातों की धूल में
ढकता चला जाता है।
फिर भी
उसके भीतर कहीं
एक कोना अब भी बचा है
जहाँ वह
उसी पुराने लड़के को देखती है
हाथ में फूल लिए,
दरवाज़े के बाहर खड़ा,
धीरे से मुस्कुराता हुआ।
और शायद इसी वजह से
वह अब भी
पूरी तरह निराश नहीं हुई।
मुकेश ,,,,,,,,,
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