रात अक्सर
थकान, ख़्वाब और नींद के बीच
अचानक उसे
अपनी ही पुरानी लड़की याद आ जाती है—
वही खिलंदड़-सी,
हँसती हुई,
बेतुकी बातों पर देर तक खिलखिलाने वाली लड़की।
Kolkata की उस ऊँची इमारत के कमरे में
अब वह
फ़ाइनैन्स रिपोर्टों,
बिजली के बिलों,
बच्चों की फ़ीस
और जीवन के भारी हिसाबों के बीच रहती है,
लेकिन भीतर कहीं
अब भी वह पुरानी लड़की साँस लेती है।
जिसने
माँ-बाप की मर्यादाओं
और समाज की सीमाओं के बीच
बहुत सावधानी से
अपनी छोटी-सी आज़ादी बचाकर रखी थी।
जिसने प्रेम भी किया,
शरारतें भी कीं,
सहेलियों के साथ
बारिशों में भीगी भी,
क्लास बंक करके
चाय भी पी,
और छत पर खड़े होकर
दूर जाती ट्रेनों को देखकर
अनगिनत सपने भी बुने।
उसे याद आता है
कैसे वह
बिना किसी कारण
सिर्फ़ हवा अच्छी लगने पर
हँस पड़ती थी।
कैसे एक समय
दुनिया इतनी कठिन नहीं लगती थी,
और भविष्य
किसी खुले मैदान की तरह दिखाई देता था।
अब रात में
जब बच्चे सो जाते हैं,
मीटिंगें समाप्त हो जाती हैं,
और मोबाइल की स्क्रीन भी शांत हो जाती है,
वह कभी-कभी
अपनी उसी पुरानी लड़की को
धीरे से याद करती है
जैसे कोई
पुरानी डायरी में रखा
सूखा हुआ फूल छू रहा हो।
और तब उसे लगता है
कि मनुष्य
कभी पूरी तरह बड़ा नहीं होता,
उसके भीतर
एक शरारती, सपनों से भरी लड़की
या लड़का
हमेशा जीवित रहता है
बस ज़िम्मेदारियों की धूल में
धीरे-धीरे ओझल हो जाता है।
मुकेश ,,,,,,
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