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Thursday, 14 May 2026

रात की वॉक के समय वह स्त्री

 Kolkata की उस बहुमंज़िला इमारत में

इन दिनों

रात की वॉक के समय

वह स्त्री

अक्सर फ़ोन पर बात करती दिखाई देती है।


धीरे-धीरे चलती हुई,

हाथ में मोबाइल,

चेहरे पर

कभी हल्की मुस्कान,

कभी गहरी सोच की परछाइयाँ।


दूसरी ओर

एक अजीब-सा आदमी होता है

थोड़ा सिरफिरा,

थोड़ा फ़िलॉसफ़र,

और थोड़ा ऐसा

जैसे दुनिया से बहुत दूर खड़ा हो।


वे कभी मिले नहीं,

सिर्फ़ आवाज़ों में

एक-दूसरे तक पहुँचे हैं।


वह आदमी

अचानक पूछ बैठता है


“तुम्हें नहीं लगता

कि आदमी की सबसे बड़ी थकान

उसका शरीर नहीं,

उसका मन ढोता है?”


कभी कहता है—


“आत्मा अगर सचमुच शांत है,

तो फिर भीतर इतना शोर क्यों है?”


वह स्त्री

चलते-चलते

रुक जाती है कुछ पल,

फिर बहुत धीरे से कहती है—

“शायद क्योंकि हम

स्वयं को कभी सच में सुनते ही नहीं…”


ऊपर

अनगिनत फ्लैटों की रोशनियाँ

आकाश में टँगे प्रश्नों जैसी लगती हैं।


नीचे

वॉकिंग लेन पर

उसके कदम चलते रहते हैं,

और फ़ोन की उस पतली-सी आवाज़ में

जैसे कोई

उसके भीतर के बंद कमरों के दरवाज़े खोलता रहता है।


वे नौकरी पर भी बात करते हैं,

बच्चों पर,

बीमारी पर,

और फिर अचानक

जीवन-मरण,

कर्म-अकर्म,

पाप-पुण्य,

आत्मा-परमात्मा तक पहुँच जाते हैं।


कभी उसे लगता है

वह आदमी बहुत उलझा हुआ है,

कभी लगता है

शायद वही पहली बार

उसे उसकी अपनी चुप्पियों का अर्थ समझा रहा है।


रात गहराती रहती है,

शहर धीरे-धीरे शांत होता है,

लेकिन उस बहुमंज़िला इमारत की

वॉकिंग लेन में

एक स्त्री

अब भी फ़ोन पर

अपने भीतर के ब्रह्मांड से बात कर रही होती है।


मुकेश ,,,,,,

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