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Monday, 25 May 2026

हर किसी को सलाह देने वाला आदमी - पहला भाग

 हर किसी को सलाह देने वाला आदमी - पहला भाग

अब जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मुझे लगता है कि हमारे मुहल्ले में वह आदमी किसी व्यक्ति से अधिक एक आदत की तरह मौजूद था।

जैसे पुराने घरों में दीवार की नमी होती है — हमेशा दिखाई नहीं देती, लेकिन लगातार बनी रहती है।

उसकी उम्र पचास के आसपास रही होगी। बाल लगभग पूरी तरह पक चुके थे। कभी-कभी वे इतने बेतरतीब रहते कि लगता कई दिनों से उसने कंघी नहीं की, और कभी वह अचानक इतना व्यवस्थित दिखाई देता कि जैसे किसी अदृश्य अवसर के लिए स्वयं को सावधानी से तैयार किया हो।

उसके कपड़ों में भी यही असंगति थी।

कई दिन कुर्ते पर हल्के दाग, चप्पलों पर धूल, दाढ़ी आधी बढ़ी हुई।
और फिर अचानक किसी शाम इस्त्री किया हुआ कुर्ता, बाल करीने से पीछे किए हुए, हल्की सुगन्ध, और आँखों में लगभग औपचारिक सजगता।

मानो वह स्वयं तय नहीं कर पाता था कि जीवन से उसने हार मान ली है या अभी कुछ बचा हुआ है।

वह मुहल्ले में अकेला रहता था।

कहते हैं, कभी कॉलेज में पढ़ाता था। कुछ लोग कहते थे कि नौकरी छोड़ दी, कुछ कहते थे कि छोड़नी पड़ी। उसके बारे में निश्चित बातें बहुत कम लोगों को मालूम थीं।

लेकिन एक बात सब जानते थे — वह हर किसी को सलाह देता था।

बच्चों को पढ़ाई की।
युवाओं को करियर की।
स्त्रियों को सम्बन्धों की।
बुज़ुर्गों को स्वास्थ्य की।
यहाँ तक कि रिक्शेवाले और दूधवाले तक उसके उपदेशों से नहीं बचते थे।

वह चलते-चलते भी किसी को रोककर कह सकता था —

“देखिए, आदमी को अपनी आदतों पर नियन्त्रण रखना चाहिए…”

या

“जीवन में सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग स्वयं को observe नहीं करते…”

उसके वाक्यों में अक्सर अंग्रेज़ी के शब्द आ जाते थे — observe, balance, emotional maturity, psychological pattern।

उसे यह भ्रम नहीं था कि लोग उससे प्रभावित हैं।
उसे इसकी आवश्यकता थी।

शायद यह अन्तर बहुत महीन है, लेकिन महत्त्वपूर्ण।

शुरू-शुरू में लोग उसे ध्यान से सुनते थे। वह पढ़ा-लिखा आदमी था, किताबें बहुत पढ़ता था। उसके कमरे में दर्शन, मनोविज्ञान, इतिहास और उपन्यासों की ढेरों किताबें थीं।

लेकिन धीरे-धीरे लोगों ने उसे एक विशेष श्रेणी में रख दिया —
“अच्छा आदमी है… पर थोड़ा ज़्यादा बोलता है।”

और यह वाक्य किसी भी संवेदनशील आदमी के लिए धीरे-धीरे अपमान बन जाता है।

मैं उससे पहली बार एक बरसाती शाम में मिला था।

वह चाय की दुकान के बाहर खड़ा था और एक लड़के को समझा रहा था कि प्रेम में “dependency” बहुत ख़तरनाक चीज़ है।

लड़का स्पष्ट रूप से ऊब चुका था, लेकिन वह आदमी अब भी पूरे धैर्य से बोल रहा था।

बारिश रुक चुकी थी। सड़क पर पानी जमा था। बिजली के खम्भों की रोशनी उसमें काँप रही थी।

उसने अचानक मेरी ओर देखा और बिना परिचय के पूछा —

“आप बताइए, आदमी प्रेम क्यों करता है?”

उस समय मुझे लगा था, वह मज़ाक कर रहा है।

लेकिन उसके चेहरे पर गम्भीरता थी।

मैंने कोई सामान्य-सा उत्तर दिया।

उसने तुरन्त सिर हिलाया —

“नहीं… आदमी प्रेम इसलिए करता है क्योंकि वह अपने भीतर की कमी को दूसरे से भरना चाहता है।”

फिर वह कुछ देर चुप रहा।

उसकी आँखें उस समय अजीब तरह से खाली लग रही थीं।

जैसे वह हमसे नहीं, स्वयं से बात कर रहा हो।

उसके बाद मैं उसे अक्सर देखने लगा।

सुबह वह कभी-कभी पार्क में दिखाई देता। हाथ में किताब। चलते-चलते अचानक किसी से चर्चा शुरू कर देता।

दोपहर में पुस्तकालय।
शाम को चाय की दुकान।
रात को अक्सर उसकी खिड़की में देर तक रोशनी जलती रहती।

उसके कमरे का दृश्य मुझे आज भी याद है।

लोहे की पुरानी अलमारी।
दीवारों तक भरी किताबें।
मेज़ पर खुली डायरी।
चश्मे के पास आधा भरा चाय का कप।
और एक कोने में बहुत दिनों से न बजाया गया छोटा-सा रेडियो।

कमरे में हमेशा पुरानी किताबों, धूल और हल्की दवा जैसी गन्ध रहती थी।

वह बात करते समय अक्सर लोगों का विश्लेषण करने लगता।

“आपके भीतर suppressed anger है…”
“आप validation खोजते हैं…”
“आप अपनी माँ से emotionally detached रहे होंगे…”

लोग आधे प्रभावित, आधे असहज हो जाते।

लेकिन विचित्र बात यह थी कि उसने अपने बारे में कभी बहुत स्पष्ट बात नहीं की।

यदि कोई उससे पूछता —
“और आप कैसे हैं?”

तो वह तुरन्त विषय बदल देता।

या सामने वाले के बारे में कुछ पूछने लगता।

धीरे-धीरे मुझे महसूस हुआ कि वह दूसरों के जीवन को समझने में जितनी रुचि लेता है, अपने जीवन से उतना ही बचता है।

जैसे सलाह देना उसके लिए केवल आदत नहीं, आत्मरक्षा हो।

एक शाम मैं उसके कमरे में बैठा था। बाहर अँधेरा हो रहा था। वह बहुत देर तक किसी लेखक के बारे में बोलता रहा। फिर अचानक चुप हो गया।

कुछ क्षण बाद उसने धीमे स्वर में पूछा —

“आपको कभी ऐसा लगता है कि आदमी दूसरों को इसलिए समझाता रहता है क्योंकि वह स्वयं अपने जीवन को समझ नहीं पाता?”

उस समय उसने मेरी ओर नहीं देखा।

वह मेज़ पर रखी बन्द डायरी को देख रहा था।

और पहली बार मुझे उसके भीतर एक गहरा अकेलापन दिखाई दिया —
बहुत शिक्षित,
बहुत व्यवस्थित शब्दों में छिपा हुआ,
लेकिन लगातार रिसता हुआ अकेलापन।

मुकेश ,,,,,,,,,

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