प्रश्नोपनिषद् — प्रथम प्रश्न — द्वादश मंत्र
मास, शुक्ल-कृष्ण पक्ष और प्राण-रयि का उपनिषदिक रहस्य
मंत्र का मूल संस्कृत पाठ
मासो वै प्रजापतिः ।
तस्य कृष्णपक्ष एव रयिः ।
शुक्लः प्राणः ।
तस्मादेते ऋषयः शुक्ले इष्टं कुर्वन्ति ।
इतर इतरस्मिन् ॥१२॥
मंत्र का हिन्दी अनुवाद
मास ही प्रजापति है।
उसका कृष्णपक्ष रयि (भौतिक पक्ष) है और शुक्लपक्ष प्राण है।
इसलिए ऋषिगण शुक्लपक्ष में यज्ञादि शुभ कर्म करते हैं; अन्य लोग दोनों पक्षों में करते रहते हैं।
भावार्थ
यह मंत्र समय को पुनः आध्यात्मिक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करता है।
यहाँ —
· कृष्णपक्ष = रयि = जड़ता, भोग, अवरोह
· शुक्लपक्ष = प्राण = चेतना, प्रकाश, आरोह
का प्रतीक है।
अन्वय
मासः वै प्रजापतिः।
तस्य कृष्णपक्षः एव रयिः।
शुक्लः प्राणः।
तस्मात् एते ऋषयः शुक्ले इष्टं कुर्वन्ति।
इतराः तु इतरस्मिन् अपि कुर्वन्ति।
संधि-विच्छेद
संधियुक्त पद | विच्छेद | संधि प्रकार |
मासोवै | मासः + वै | विसर्ग संधि |
कृष्णपक्ष | कृष्ण + पक्ष | समास |
तस्मादेते | तस्मात् + एते | व्यंजन संधि |
शुक्लेष्टम् | शुक्ले + इष्टम् | स्वर संधि |
इतरस्मिन् | इतर + अस्मिन् | स्वर संधि |
शब्दार्थ एवं व्याकरणिक विश्लेषण
१. मासः चन्द्रमास। यहाँ काल का सूक्ष्म विभाजन।
२. कृष्णपक्षः चन्द्र का क्षयकाल। प्रतीकात्मक अर्थ — अवरोह, भौतिकता।
३. रयिः प्रश्नोपनिषद् में — रयि = पदार्थ, अन्न, प्रकृति।
४. शुक्लः प्रकाशमय। उन्नयनकारी।
५. प्राणः चेतन शक्ति। जीवन का प्रकाश।
आदि शंकराचार्य भाष्य (संशोधित एवं शुद्ध रूप)
यस्मिन्निदं भूतं विश्वं स एव प्रजापतिः संवत्सराख्यः स्वावयवे मासे परिसमाप्यते। मासो वै प्रजापतिः यथाव्याख्यातरयिप्राणात्मकः। तस्य मासात्मनः प्रजापतेः एको भागः कृष्णपक्षः रयिः अन्नं चन्द्रात्मकः। अपरः भागः शुक्लपक्षः प्राणः आदित्यात्मकः। अतः अभियेष्यन्तः शुक्लपक्षात्मकं प्राणं सममेव प्रयन्ति। तस्मात् प्राणदर्शनात् एते ऋषयः कृष्णपक्षे यागं न कुर्वन्ति, शुक्लपक्षे एव कुर्वन्ति। प्राणव्यतिरेकेण कृष्णपक्षः तैः न दृश्यते। यस्मात् इतराः तु प्राणं न पश्यन्ति, तस्मात् अदर्शनलक्षणं कृष्णात्मकं न एव पश्यन्ति। इतराः इतरस्मिन् कृष्णपक्षे एव यजन्ति, शुक्ले इव यजन्तः अपि॥
शंकरभाष्य का हिन्दी अनुवाद
शंकराचार्य कहते हैं —
जिस प्रजापति को संवत्सर कहा गया था, वही अपने अवयव रूप मास में विभक्त होता है।
उस मास का कृष्णपक्ष रयिरूप, चन्द्रात्मक और अन्नस्वरूप है।
शुक्लपक्ष प्राणस्वरूप और आदित्यात्मक है।
अतः जो ऋषि प्राणतत्त्व को देखते हैं, वे शुक्लपक्ष में ही यज्ञादि कर्म करते हैं।
वे कृष्णपक्ष को प्राणरहित, जड़ और अवरोही मानते हैं।
किन्तु सामान्य लोग इस सूक्ष्म भेद को नहीं समझते; इसलिए वे दोनों पक्षों में कर्म करते हैं।
दार्शनिक विवेचन
१. समय का आध्यात्मिक विभाजन : उपनिषद् समय को केवल गणितीय नहीं मानता।समय स्वयं चेतना का प्रतीक बन जाता है।
२. कृष्णपक्ष = रयि,
रयि का अर्थ —अन्न, पदार्थ, भोग, जड़ता। कृष्णपक्ष में चन्द्र का क्षय होता है; इसलिए यह अवरोह का प्रतीक है।
३. शुक्लपक्ष = प्राण
शुक्लपक्ष में चन्द्र वृद्धि करता है।अतः यह — उन्नयन, विकास, प्रकाश,चेतना का प्रतीक है।
४. ऋषियों की दृष्टि : शंकराचार्य कहते हैं —ज्ञानी केवल बाहरी तिथि नहीं देखते; वे प्राणतत्त्व देखते हैं।यह अत्यन्त सूक्ष्म व्याख्या है।
५. कर्म और चेतना : उपनिषद् संकेत देता है —कर्म का फल केवल बाहरी क्रिया पर नहीं, तना की अवस्था पर निर्भर है।
६. अदर्शनलक्षण कृष्ण : शंकराचार्य का यह वाक्य अत्यन्त गहरा है।कृष्णपक्ष यहाँ केवल न्धकार नहीं; आत्मदर्शन का अभाव है।
अन्य उपनिषदों से साम्य
छान्दोग्य उपनिषद् : देवयान और पितृयान में शुक्ल-कृष्ण मार्ग का विवेचन।
भगवद्गीता : “अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः…”(८.२४)
कठोपनिषद् : श्रेय और प्रेय का भेद।
शोधपूर्ण निबंध
शुक्ल और कृष्ण : भारतीय चेतना-दर्शन का प्रतीकवाद
प्रश्नोपनिषद् का द्वादश मंत्र भारतीय प्रतीकवाद की अद्भुत गहराई को उद्घाटित करता है।
यहाँ चन्द्रमा के पक्ष केवल खगोलीय अवस्थाएँ नहीं। वे चेतना की अवस्थाएँ हैं।
शुक्लपक्ष वृद्धि, प्रकाश और आध्यात्मिक आरोहण का प्रतीक है। कृष्णपक्ष क्षय, भोग और अवरोह का।
यह विभाजन नैतिक नहीं, आध्यात्मिक है। उपनिषद् कृष्णपक्ष को पाप नहीं कहता; वह उसे भौतिकता का प्रतीक मानता है।
शंकराचार्य की व्याख्या विशेष महत्त्वपूर्ण है। वे कहते हैं कि ज्ञानी कृष्णपक्ष में “प्राण” नहीं देखते। अर्थात् वहाँ चेतना की उत्कर्षगति नहीं।
यहाँ “प्राण” केवल श्वास नहीं; आत्मप्रकाश है।
भारतीय कालदर्शन की यह विशेषता है कि समय को चेतना से जोड़ा गया। आधुनिक युग में समय वस्तुनिष्ठ (objective) माना जाता है; उपनिषद् उसे आध्यात्मिक अनुभूति का आयाम मानता है।
प्रश्नोपनिषद् का द्वादश मंत्र समय, चेतना और कर्म के गहरे सम्बन्ध को उद्घाटित करता है।
यह बताता है कि —
· शुक्ल और कृष्ण केवल चन्द्रपक्ष नहीं,
· वे चेतना की दिशाएँ हैं।
ज्ञानी प्राणमय, प्रकाशमय मार्ग का अनुसरण करते हैं, जबकि सामान्य मनुष्य केवल बाहरी कर्म में प्रवृत्त रहता है।
इस प्रकार यह मंत्र भारतीय आध्यात्मिक प्रतीकवाद और कालदर्शन का अत्यन्त सूक्ष्म एवं गहन निरूपण प्रस्तुत करता है।
मुकेश ,,,,,,,
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