प्रश्नोपनिषद् — प्रथम प्रश्न — एकादश मंत्र
काल, संवत्सर और विश्वचक्र का उपनिषदिक रहस्य
मंत्र का मूल संस्कृत पाठ
प्रश्नोपनिषद् — प्रथम प्रश्न — एकादश मंत्र :
पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं
दिव आहुः परेऽर्धे पुरीषिणम् ।
अथेमे अन्ये परे विचक्षणं
सप्तचक्रे षडर आहुरर्पितम् ॥११॥
मंत्र का हिन्दी अनुवाद
कुछ विद्वान उस संवत्सररूप प्रजापति को —पाँच चरणों वाला, बारह रूपों वाला, आकाश के उच्च भाग में स्थित, तथा जलवर्षण करने वाला पिता कहते हैं।
अन्य विवेकी मनीषी उसे — सात चक्रों वाला, छह आरों वाला, और सम्पूर्ण जगत् में प्रतिष्ठित
बताते हैं।
भावार्थ
यह मंत्र वैदिक कालदर्शन का अत्यन्त गूढ़ प्रतीकात्मक निरूपण है।
यहाँ संवत्सर (काल) को — प्रजापति, सूर्य, तथा विश्वचक्र के रूप में देखा गया है।सम्पूर्ण जगत् काल के चक्र में प्रतिष्ठित है।
अन्वय
केचित् विद्वांसः पञ्चपादम्, पितरम्, द्वादशाकृतिम्, दिवः परे अर्धे स्थितम्, पुरीषिणम् आहुः।
अथ अन्ये विचक्षणाः तम् सप्तचक्रे, षडरे, अर्पितम् आहुः।
संधि-विच्छेद
संधियुक्त पद | विच्छेद | संधि प्रकार |
पञ्चपादम् | पञ्च + पादम् | समास |
द्वादशाकृतिम् | द्वादश + आकृतिम् | स्वर संधि |
परेऽर्धे | परे + अर्धे | अवग्रह |
पुरीषिणम् | पुरीष + इणिन् | तद्धित |
अथेमे | अथ + इमे | स्वर संधि |
सप्तचक्रे | सप्त + चक्रे | समास |
षडर | षट् + अर | व्यंजन संधि |
शब्दार्थ एवं व्याकरणिक विश्लेषण
१. पञ्चपादम् : पाँच चरणों वाला। शंकराचार्य के अनुसार — हेमन्त, शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा
— इन पाँच ऋतुओं का संकेत। कभी हेमन्त-शिशिर को एक माना जाता है।
२. पितरम् : जनक, पालनकर्ता। काल सम्पूर्ण जगत् का उत्पादक है।
३. द्वादशाकृतिम् : बारह रूपों वाला। अर्थात् — बारह मास।
४. पुरीषिणम् : जल से युक्त, वर्षा करने वाला। सूर्य-चक्र द्वारा वर्षा का संकेत।
५. सप्तचक्रे : सात चक्रों वाला।
विभिन्न व्याख्याएँ — सप्त अश्व, सप्त छन्द, सप्त लोक, प्रकाश की सात धाराएँ।
६. षडर : छः आर (spokes)। अर्थ —षडृतु।
आदि शंकराचार्य भाष्य (संशोधित एवं शुद्ध रूप)
पञ्चपादं पञ्चत्वः पादा इवास्य संवत्सरात्मन आदित्यस्य वर्तमानाः पादैरिव ऋतुभिरावर्तते। हेमन्तशिशिरावेकीकृत्य एषा कल्पना। पितरं सर्वस्य जनयितृत्वात् पितृत्वं तस्य। द्वादशाकृतिं द्वादश मासा आकृतयोऽवयवा इव अस्य। दिवः परे अर्धे ऊर्ध्वस्थाने स्थितम्। पुरीषिणं पुरीषवन्तम् उदकवन्तम् आहुः कवयः। अथ तमेव अन्ये परे कारुविदः विचक्षणं निपुणं सप्तचक्रे सप्ताश्वरूपेण चक्रे सततगतिमत्, षडरं षडृतुमत् आहुः। सर्वमिदं जगत् तस्मिन् अर्पितम् इव रथनाभौ निविष्टम्। एवं पञ्चपादो द्वादशाकृतिः सप्तचक्रः षडरः सर्वथा अपि संवत्सरः कालात्मा प्रजापतिः चन्द्रादित्यलक्षणः जगतः कारणम्॥
शंकरभाष्य का हिन्दी अनुवाद
शंकराचार्य कहते हैं —
संवत्सररूप आदित्य पाँच चरणों वाला कहा गया है, क्योंकि पाँच ऋतुएँ उसके चरणों के समान हैं।
हेमन्त और शिशिर को एक मानकर यह गणना की गई है।
वह “पिता” है क्योंकि वही सम्पूर्ण जगत् का जनक है।
उसके बारह रूप बारह मास हैं।
वह आकाश के उच्च भाग में स्थित है और जलयुक्त अर्थात् वर्षा कराने वाला है।
कुछ विवेकी विद्वान उसे सात चक्रों और छह आरों वाला कहते हैं —
· सात चक्र — सात अश्वों या गति-चक्रों के रूप में,
· छह आर — षडृतुओं के रूप में।
सम्पूर्ण जगत् उसी में ऐसे प्रतिष्ठित है जैसे रथ की नाभि में अराएँ।
इस प्रकार संवत्सररूप काल ही चन्द्र और सूर्यात्मक प्रजापति तथा जगत् का कारण है।
दार्शनिक विवेचन
१. काल का दैवीकरण : वैदिक चिन्तन में समय केवल गणना नहीं। वह — जीवित शक्ति, सृष्टिकर्ता, प्रजापति है।
२. संवत्सर : ब्रह्माण्डीय चक्र यहाँ वर्ष को केवल खगोलीय घटना नहीं माना गया। वह सृष्टि की धड़कन है।
३. पाँच चरण : ऋतुएँ समय के चरण हैं। यह काल की गतिशीलता का प्रतीक है।
४. द्वादश आकृतियाँ : बारह मास केवल महीनों का क्रम नहीं।वे सूर्यचक्र की अभिव्यक्तियाँ हैं।
५. सप्तचक्र : सात का वैदिक प्रतीकवाद अत्यन्त गहरा है — सप्तलोक, सप्तऋषि, सप्तछन्द, सप्तधातु।
६. षडर : रथ के पहिए की तरह काल का चक्र छह ऋतुओं से चलता है।
७. जगत् की निर्भरता : रथनाभि का रूपक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।जैसे पहिए की समस्त अराएँ नाभि पर टिकी होती हैं, वैसे ही सम्पूर्ण जगत् काल पर आश्रित है।
अन्य उपनिषदों और वैदिक सन्दर्भों से साम्य
ऋग्वेद : सूर्य और काल के चक्र का बारम्बार वर्णन मिलता है।
मुण्डक उपनिषद् : सृष्टि को ब्रह्म से निकले चक्र के रूप में देखता है।
भगवद्गीता : “कालोऽस्मि…”
शोधपूर्ण निबंध
संवत्सर : वैदिक कालदर्शन और विश्वचक्र
प्रश्नोपनिषद् का एकादश मंत्र भारतीय कालदर्शन की महान परम्परा का प्रतिनिधित्व करता है।
पाश्चात्य चिन्तन में समय प्रायः रैखिक (linear) माना गया है, जबकि भारतीय दृष्टि में समय चक्रीय (cyclical) है।
संवत्सर यहाँ केवल वर्ष नहीं; ब्रह्माण्डीय लय है।
ऋतुओं का परिवर्तन, सूर्य की गति, वर्षा का चक्र, जन्म और मृत्यु — सब उसी संवत्सर के रूप हैं।
शंकराचार्य इस मंत्र की व्याख्या करते हुए स्पष्ट करते हैं कि काल स्वयं प्रजापति है। अर्थात् सृष्टि और काल अलग नहीं।
“रथनाभि” का रूपक अत्यन्त सूक्ष्म है। जैसे चक्र की समस्त अराएँ केन्द्र पर निर्भर हैं, वैसे ही सम्पूर्ण अस्तित्व काल पर आधारित है।
यह दृष्टि आधुनिक भौतिकी के “space-time continuum” की भी स्मृति कराती है, जहाँ समय ब्रह्माण्ड की संरचना का मूल तत्त्व माना जाता है।
किन्तु उपनिषद् इससे आगे जाता है। वह समय को भी ब्रह्म की अभिव्यक्ति मानता है।
प्रश्नोपनिषद् का एकादश मंत्र काल, सूर्य और सृष्टि की अद्वैतात्मक एकता को उद्घाटित करता है। यह मंत्र बताता है कि — संवत्सर ही प्रजापति है, वही जगत् का आधार है, और सम्पूर्ण विश्व उसी कालचक्र में प्रतिष्ठित है।
इस प्रकार यह मंत्र भारतीय कालदर्शन, ब्रह्माण्ड-विज्ञान और आध्यात्मिक प्रतीकवाद का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है।
मुकेश ,,,,,,,
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