Kolkata की उस बहुमंज़िला इमारत वाली स्त्री
और बाहर चलती हुई Durga Puja
दोनों एक ही शहर की दो परछाइयाँ लगती हैं।
एक ओर
सड़कों पर पंडाल सजते हैं,
ढाक की आवाज़ गूँजती है,
और मूर्तियों में
स्त्री को “शक्ति” के रूप में पूजा जाता है
दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सरस्वती।
और दूसरी ओर
उसी शहर की ऊँची इमारतों में
एक असली स्त्री
हर दिन
थकान, नौकरी, घर, रिश्ते
और बीमारी तक से लड़ती हुई
चुपचाप जीवन ढो रही होती है।
यह एक गहरा विरोधाभास है
जहाँ समाज
स्त्री को देवी कहकर
मंदिरों में ऊँचा स्थान देता है,
वहीं जीवन के व्यवहार में
उसकी साधारण थकान
अक्सर अनदेखी रह जाती है।
पर उस स्त्री के भीतर
कुछ और भी है
जो केवल “कर्तव्य” नहीं,
“शक्ति” भी है।
वही शक्ति
जो उसे
बच्चों का नाश्ता बनाते-बनाते
ऑफिस की रिपोर्ट संभालने देती है,
बीमारी से लड़ते हुए भी
मुस्कुराने का साहस देती है,
और टूटते रिश्तों के बीच भी
घर को गिरने नहीं देती।
Durga Puja की मूर्ति में
जिस शक्ति का रूप दिखता है
वह किसी मंदिर की चीज़ नहीं,
कई बार
इसी तरह की स्त्रियों के जीवन में
चुपचाप चलती रहती है।
फर्क बस इतना है
एक को हम “देवी” कहकर सजाते हैं,
और दूसरी को
“ज़िम्मेदारी निभा रही स्त्री” कहकर भूल जाते हैं।
लेकिन सच शायद यह है
देवी बाहर नहीं आती,
वह रोज़
इन बहुमंज़िला इमारतों में
रसोई, ऑफिस और वॉकिंग लेन के बीच
अपना जीवन जीती हुई
हर उस स्त्री में
धीरे-धीरे दिखाई देती है
जो टूटकर भी
दुनिया को सँभाले रखती है।
मुकेश ,,,,,,,
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