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Thursday, 14 May 2026

ऐसी न जाने कितनी स्त्रियाँ

 ऐसी न जाने कितनी स्त्रियाँ

इस ज़माने में मिल जाएँगी


जो सुबह

बच्चों के टिफ़िन और

ऑफ़िस की मीटिंगों के बीच

अपने बाल भी ठीक से नहीं सँवार पातीं,


जो पूरे घर की धुरी होती हैं

लेकिन जिनकी थकान

किसी को दिखाई नहीं देती।


जो मुस्कुराकर

सबका मन रखती हैं,

और रात को

अपने ही तकिए पर

चुपचाप बिखर जाती हैं।


जो प्रेम में

बहुत छोटी-छोटी चीज़ें चाहती हैं

पीछे से आकर

कोई बाँहों में भर ले,

पूछ ले—

“थक गई हो क्या?”


लेकिन अक्सर

उन्हें मिलता है

सिर्फ़ ज़िम्मेदारियों का लंबा हिसाब

और चुप्पियों से भरा साथ।


ऐसी स्त्रियाँ

कभी कॉलेज की सबसे चंचल लड़कियाँ थीं,

जो बारिश में भीगती थीं,

हँसते-हँसते रो पड़ती थीं,

और प्रेम-पत्रों में

पूरी दुनिया बसा लेती थीं।


फिर समय ने

धीरे-धीरे

उन्हें माँ, पत्नी, कर्मचारी, बहू

और न जाने क्या-क्या बना दिया।


पर भीतर कहीं

वे अब भी

एक छोटे-से स्नेह की प्रतीक्षा करती हैं

फूलों के किसी पुराने गुलदस्ते जैसी।


Kolkata की उस बहुमंज़िला इमारत वाली लड़की

दरअसल अकेली नहीं है।


उसकी तरह

हज़ारों स्त्रियाँ

हर शहर, हर घर, हर मंज़िल पर

अपनी-अपनी चुप लड़ाइयाँ लड़ रही हैं

और फिर भी

हर सुबह उठकर

दुनिया को संभाल रही हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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