जो कुछ मैंने लिखा
वह मेरे होने का प्रमाण नहीं था
वह केवल उन जगहों का नक्शा था
जहाँ-जहाँ मैं नहीं पहुँच पाया
मेरी कविताएँ
मेरे उत्तर नहीं थीं
वे उन प्रश्नों की राख थीं
जो बहुत देर तक जलते रहे
और जिनकी आग
आज भी कहीं
मेरे मौन में बची हुई है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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