तन्हाई की गन्ध
तन्हाई की गन्ध बहुत पुरानी होती है,
जैसे बिना छुए रखी किताबों की।
कमरे के कोनों में वह चुपचाप बैठी रहती है,
और घड़ी की टिक-टिक को भारी कर देती है।
ना वह किसी को बुलाती है,
ना किसी से जाती है।
सूफ़ी इसे भी एक साथी मानते हैं,
जहाँ इंसान खुद से मिलता है,
और खुद को ही खो देता है,
एक अनजानी सी शांति में
मुकेश ,,,,,
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