होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Monday, 10 March 2014

ज़रा सी शरारत और तारीफ में तो शरमा जाते हैं वो

ज़रा सी शरारत और तारीफ में तो शरमा जाते हैं वो
जाने अंजामे अदा क्या होगी जब वस्ल की रात होगी
मुकेश इलाहाबादी ----------------------------------------

इश्क़ की बेचैनियाँ देखी

इश्क़ की
बेचैनियाँ देखी
ज़माने की
तल्खियां देखी
मौसमे खिज़र में
शाख से टूटती
ज़र्द पत्तियां देखी
गुलाब को भी
मात कर दे
रुखसार की ऐसी
सुर्खियाँ देखी
वक़्त से पहले बुढ़ाती
तमाम जवानियाँ देखी
भीड़ के चेहरे पे चस्पा
चुप्पियाँ देखी
किसी भी साज़ से न टूटे
हमने ऐसी खामोशियाँ देखी
नज़्म में मुकेश की
ढेरों खूबियां देखी

मुकेश इलाहाबादी --------

Sunday, 9 March 2014

माना कि ये सच है मै उसकी जुबां पे नही

माना कि ये सच है मै उसकी जुबां पे नही
मगर ये सच है भी मै उसके तसव्वुर मे हूँ
मुकेश इलाहाबादी --------------------------

ज़िंदगी हर रोज़ सरकती जा रही

ज़िंदगी हर रोज़ सरकती जा रही
मुट्ठी की रेत से फिसलती जा रही

चहचहा के परिंदे नीड़ पे लौट गए
धूप  सायबान से उतरती जा रही

कुछ उम्र कुछ ज़िंदगी की थकन
है चेहरे पे  शिकन बढ़ती जा रही

हर तरफ लड़ाई दंगा आतंकवाद
इंसानियत हर रोज़ मरती जा रही

इश्को मुहब्बत की क्या बात करे
उम्र मुकेश की भी ढलती जा रही

मुकेश इलाहाबादी -------------------

मुकेश बन के बादल न बरसता तो क्या करता ?

मुकेश बन के बादल न बरसता तो क्या करता ?
तमाशाई, बहुत थे कोई आग बुझाने वाला न था
मुकेश इलाहाबादी ----------------------------------

गौर से

गौर से
बिना फल
बिना पत्तियों के
सूखे पेड़ देखता हूँ
शायद इनमे
अपना प्रतिबिम्ब देखता हूँ

मुकेश इलाहाबादी -----------a

Saturday, 8 March 2014

अपने रुखसार की

अपने
रुखसार की
एक चुटकी सुर्खी
मल दो मेरे चेहरे पे
ताकि मै भी हो जाऊं
लाल गुलाल

अपने गीले गेसुओं को
झटक दो मेरे चेहरे पे
ताकि चांदी सी महमाती हुई
इन चांदी सी बूंदों से
महमा उट्ठे मेरा भी वज़ूद

अपने
सूने उपवन के
पट खोल दिए हैं मैंने
ताकि तुम आकर
डाल सको
एक फागुनी नज़र
और हरिया जाए
मेरा भी तन मन

मुकेश इलाहाबादी -----