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Monday, 2 June 2014

सिर्फ घर और ऑफिस के बीच की दूरी रह गयी होती

सिर्फ घर और ऑफिस के बीच की दूरी रह गयी होती
ख्वाब न होते तो ये ज़िंदगी कितनी सिमट गयी होती
मुकेश इलाहाबादी -------------------------------------------

मै लिखता हूँ प्यार

मै लिखता हूँ प्यार
वो लिखता व्यापार 

नदी किनारे वो बैठा
मै बैठा हूँ  इस पार

छोड़ मुझे गैरों से वो
है करता आँखें चार

मै उसका कुछ नहीं
पर वह मेरा संसार

थोड़ा नखरीला सही
पर है तो मेरा प्यार

मुकेश इलाहाबादी --

Sunday, 1 June 2014

इंकार में ग़म से मर जाना है

इंकार में ग़म से मर जाना है , और इक़रार में खुशी से
मुकेश न थाम इश्क़ का खंज़र इसके दोनों तरफ धार है
मुकेश इलाहाबादी ----------------------------------------

वह अपना दर्दे ज़ीस्त बयाँ करता रहा

वह अपना दर्दे ज़ीस्त बयाँ करता रहा
लोग समझे कि मुकेश शायर हो गया
मुकेश इलाहाबादी -----------------------

आसमाँ पे पहरे हैं, उड़ के क्या करूँ ?

आसमाँ पे पहरे हैं, उड़ के क्या करूँ ?
आओ चलो रख लूँ अपने पर उतार के
मुकेश इलाहाबादी ---------------------

जिसके नाम की चिट्ठी बाँचू

जिसके नाम की चिट्ठी बाँचू
उसके नाम पे चुप रह जाऊँ

मै लाज शरम की ऐसी मारी
अपनी बातें उससे कह न पाऊँ

मुझसे करे इशारा छत पे आऊँ
कि दिल मोरा धड़के मै,न जाऊं

मार कंकरिया संग फेंका चिट्ठी
घबराऊँ,एक सांस में पढ़ जाऊं 

मुकेश इलाहाबादी --------------

वो मील का पत्थर आज भी तनहा खड़ा है

वो मील का पत्थर आज भी तनहा खड़ा है
जिस मोड़ पे उस पत्थर पे छोड़ गए थे जंहा

मुकेश इलाहाबादी ------------------------------