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Sunday, 15 October 2017

जाने कौन सा जादू जानते हो संवरते जा रहे हो

जाने कौन सा जादू जानते हो संवरते जा रहे हो
उम्र बढ़ने के साथ -साथ और खिलते जा रहे हो

कौन सी नदी या फुहारे में  नहाते हो तुम जो ?
जिधर से गुज़रते हो इत्र सा महकते जा रहे हो

मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------

Monday, 9 October 2017

तुम्हे छू लेना चाहता हूँ

मै
तुम्हे छू लेना चाहता हूँ
बिलकुल वैसे ही
जैसी सुबह की ठंडी बयार
छू कर गुज़र जाती है
किसी ताज़े खिले फूल को
और फिर देर तक महकती रहती है छत पे

मुकेश इलाहाबादी -------------------------

Sunday, 8 October 2017

मशालें कंही खो गयी

हैलोजम
और नियॉन बल्ब की
रोशनी में मशालें कंही खो गयी हैं
आओ एक बार फिर चलें हम
मनाने चलें उन हाथों को
जो मशालें लिए आगे - आगे चला करते थे
लड़ने के लिए
अँधेरे एक ख़िलाफ़

मुकेश इलाहाबादी -------------

ऐसा क्यूँ होता है ?

ऐसा
क्यूँ होता है ?
राजा
और सत्ता को सिर्फ
फ़ैली हुई हथेलियां ही अच्छी लगती हैं ?

ऐसा
क्यूँ होता है ?
जब, फ़ैली हुई हथेली
मुट्ठी में तब्दील हो जाती है तो
सत्ता को उसमे से बग़ावत की बू आने लगती है ,

मुकेश इलाहाबादी -----------------------

हे गंगे, अच्छा होता, तुम

हे गंगे,
अच्छा होता, तुम
पाप के साथ- साथ पुण्य भी
धो देतीं
क्यूँ कि पाप के बोझ से  ज़्यादा
पुण्य के अहंकार से धरती
पाताल में धंसती जा रही है

मुकेश इलाहाबादी --------------

Friday, 6 October 2017

जब भी तुम खुश हो

जब
भी तुम खुश हो
हँसना
खूब हंसना जोर जोर से
उड़ना चिड़िया सा
या फिर फुदकना गिलहरी सा
और
नाचना आंगन में
बड़े से घांघरे को गोल गोल फहरा के

पर
जिस दिन जी उदास हो
मन रोने -रोने को हो
किसी के कांधे पे सर रख सोने को मन हो
बेशक - आ जाना मेरे पास

मिलूँगा मै तुम्हे
तुम्हारे इंतज़ार में

मुकेश इलाहाबादी ----------------------

Monday, 2 October 2017

तेरी अदाओं की सोंधी मिट्टी

तेरी
अदाओं की सोंधी मिट्टी
को  चाहत के आब से गूंथ के
वक़्त के चाक पे रख दिया है
देखना एक दिन ईश्क़ का
चराग़ ज़रूर मुकम्मल होगा
जिसकी रोशनी से रौशन होंगे
हमारे, दिन और रात

मुकेश इलाहाबादी ------------------