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Thursday, 31 December 2015

बात अपनी हम बताने कहाँ जाए

बात अपनी हम बताने कहाँ जाए
ग़म अपना हम सुनाने कहाँ जाए
लोग  हाथों  में पत्थर लिए बैठे हैं
ऐसे में हम सर छुपाने कहाँ जाएँ
चोट पे नमक छिड़क देते हैं लोग
ऐसे में ज़ख्म दिखाने  कहाँ जाएँ
जाने किधर रूठ के तुम चले गए
बेगाने शहर में ढूंढने कहाँ जाएँ ?
तुम भी नहीं हो शहर में, ऐसे में
नया साल हम मनाने कहाँ जाएँ 
हर शख्श ग़मज़दा दिखता यहाँ
मुकेश बता मुस्कुराने कहाँ जाएँ 

मुकेश इलाहाबादी -----------------

सिलसिला बनाये रखिये

सिलसिला बनाये रखिये
दोस्ती  निभाए   रखिये
हार गए हो तो भी क्या
हौसला  बनाये  रखिये
फल  मिले  या न मिले
प्रेम पौध लगाये रखिये  
भले कोई कांटे बोता रहे
आप फूल खिलाये रखिये
मुकेश इलाहबदी ------

Wednesday, 30 December 2015

जुएँ बीनती औरत



अक्सर
जब
थके बदन
कम हीमोग्लोबिन
वाली औरत
धूप में बैठ
दूसरी अपनी जैसी
औरत के बालों से
जूएँ बीन रही होती है
तब दरअसल वह
अपने दुःख बीन रही होती है 
ज़मीन पे रख के
अंगूठे पे तर्जनी के दबाव पे
अपना क्षोभ, गुस्सा और हताशा
जुएँ को मार के निकाल रही होती है

औरत जब दूसरी औरत के सिर से
जुएँ निकल कर मार रही होती है

मुकेश इलाहाबादी -----------------

मौलिक और अप्रकाशित

जुएँ बीनती औरत

तुम इतना न, लाड दिखाया करो

तुम इतना न, लाड दिखाया करो
कभी तो मुझपे गुस्सा हुआ करो

तुम बिन अब जिया लगता नहीं
मुझे छोड़ कर न तुम जाया करो

माना कि गुस्से में प्यारे लगते हो
जब प्यार करूँ तो मुस्काया करो

मुकेश बिखरी बिखरी मेरी लट 
अपनी उंगली से सुलझाया करो

तुम इत्ती प्यारी ग़ज़लें कहते हो
कभी तो मेरे लिए भी गाया करो

मुकेश इलाहाबादी -----------------

मेरा नाम सुन के मुस्कुराते हैं


मेरा नाम सुन के मुस्कुराते हैं
या  फिर लोग खफा हो जाते हैं

कुछ तो अलहदा होगा मुझमे 
लोग यूँ ही नहीं खिचे आते हैं  

अपनों का सुःख दुःख मेरा है
सब अपनी बात बता जाते हैं

मुकेश नेकियाँ भूल कर सभी
वक़्त पे गलतियाँ गिनाते  हैं

मुकेश इलाहाबादी -----

जब अँधेरा घना होता है


जब अँधेरा घना होता है
साया  भी  जुदा  होता है
डाल से बिछड़ के फूल
फिर जाने कहाँ होता है
पास माँ और गुब्बारा हो
खुश तब बच्चा होता है
सावन के अंधे के लिए
चारों तरफ हरा होता है
मुकेश चराग़ के तले तो
हमेशा ही अँधेरा होता है

मुकेश इलाहाबादी -----

गर हमको अपनी आँख का काजल बना लिया होता

गर हमको अपनी आँख का काजल बना लिया होता
तेरी ख़ूबसूरती में कुछ और ही निखार आ गया होता
सुना है बातचीत में तुम्हे एहसास ऐ नाज़ुकी पसंद है
मै भी तुम्हारे नाज़ुक कदमो पे चाँदनी सा बिछा होता
लोग तो मेहबूब बातोँ के चाँद सितारे तोड़ लाते होंगे
ग़र तूने कहा होता मै खुदबखुद सितारा बन गया होता

मुकेश इलाहाबादी -------------------------------------