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Wednesday, 31 August 2016

तुमसे मिलना बतियाना अच्छा लगता है

तुमसे मिलना बतियाना अच्छा लगता है
ये आदत न बन जाये ये भी डर लगता है 
मुकेश इलाहाबादी ------------------------

जैसे किसी के ज़ेहन से यह बात उतर जाये

जैसे
ज़ेहन से
यह बात उतर जाये
कि उसने किताब के
पन्नो के बीच
गुलाब की एक कली
आहिस्ते से रखी थी कभी 
या कि 
किसी बहुत आत्मीय का
प्यारा सा ख़त अलमारी में
रखा था
बस ऐसे ही
तुम मुझे भूली नहीं हो
तुम्हारे ज़ेहन से उतर भर गया हूँ

किसी दिन
अचानक किसी किताब को उलटते हुए
मुरझाए फूल सा मिलूंगा
या फिर ज़र्द पड़ गए खत सा
अलमारी में दबा मिलूँगा
तब तुम
फिर फिर मुझे याद करोगी
प्यार करोगी पूरी शिद्दत से

क्यूँ की तुम मुझे भूली नहीं हो
बस तुम्हारे ज़ेहन से उतर भर गया हूँ

(मेरी प्यारी सुमी)

मुकेश इलाहाबादी ---- 

बस
ऐसे ही तुम मुझे भूली नहीं हो



और यह बात
ज़ेहन से उतर जाए  भूल जाए
बहुत बहुत दिनों के लिए
या कि
किसी आत्मीय का
प्यारा सा ख़त
अलमारी में या किसी बक्से में
अख़बार के नीचे छुपा के
भूल जाए बहुत बहुत दिनों के लिए

बस ऐसे ही मैं
तुम्हारे ज़ेहन से उतर
भूल जाए
बहुत बहुत दिनों के लिए

तुझे देखता हूँ तो हैरत सी होती है

तुझे देखता हूँ तो हैरत सी होती है
इतनी खूबसूरत औरत भी होती है

तेरा दीदारे हुस्न जब भी जो करे है
उसे ही तुमसे मोहब्बत सी होती है

इश्क मे भले पहले हो ले रूसुवाइयां
बाद मरने के तो शोहरत होती है

संग साथ पा के तेरा खुश रहता हूँ
बिन तेरे ज़िन्दगी बेगैरत सी होती है

मुकेश इलाहाबादी ...............

ज़िन्दगी हमे आजमाने लगी

ज़िन्दगी हमे आजमाने लगी
कश्ती हमारी डगमगाने लगी
देख तेरे खिले महुए सी हंसी
हसरते फिर मुस्कुराने लगी
मुद्दतों से  वीरान  था आँगन
तुम  क्यूँ पायल बजाने लगी
पुरानी  हवेली  टूटी  मुंडेर पेएए
फिर बुलबुल चहचहाने लगी
बेवजह  आग  लगा दी तुमने
गीली  थी लकड़ी धुआने लगी
मुकेश इलाहाबादी ............

अपनी धुन का पक्का है

अपनी धुन का पक्का है
मन का लेकिन सच्चा है

थोडा गुस्सा थोडा प्यार
दिल तो उसका बच्चा है

कभी न उतरे तेरा रंगएए
रंग तेरा इतना पक्का है

तेरी महकी . 2 साँसों से
दिल धडके जैसे पत्ता है

बातें तेरी मीठी मीठी पर
बोसा तेरा खट मिट्ठा है

मुकेश इलाहाबादी .......

रात पूनम की इल्तजा मे अमावश ले के बैठे हैं

रात पूनम की इल्तजा मे अमावश ले के बैठे हैं
भूल बैठा चॉद कि हम इक आस ले के बैठे हैं

कभी तो चस्मा ऐ मुहब्बत उनके दिल मे फूटेगा
सदियों से इसी सहरा मे हम प्यास लेके बैठे हैं

मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------

रोशनी कम होती जा रही है

रोशनी कम होती जा रही है
परछाइयां बढती जा रही हैं

विष्वास और प्रेम की नदी
हर रोज सूखती जा रही है

यादों ने जोड़ रखा था तुमसे
वह कडी भी टूटती जा रही है

विरह यामिनी सौत बन गयी
प्रेम की लडी टूटती जा रही है

तुम्हारे वियोग मे सखी देह
रात दिन गलती जा रही है

मुकेश इलाहाबादी --------------------