दरिया ए मुहब्बत में

बैठे ठाले की तरंग ------------

दरिया  ए  मुहब्बत  में बहता  रहा बदन
इश्क की आग में जल  कुंदन हुआ बदन

हिज्र  के इज़्तिराब  में  तपता  रहा बदन
कि, रात मेरा यार आया कुंदन हुआ बदन

मुकेश इलाहाबादी ------------------------

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है