हरिवंश पुराण - तृतीय खंड — भाग 26 - द्वारका का विस्तार — नगर, समुद्र और राजनीतिक भूगोल मथुरा से पश्चिम की यात्रा हरिवंश के विष्णुपर्व में द्वारका की स्थापना का प्रसंग यादवों की यात्रा से आरम्भ होता है। जरासंध के निरंतर विरोध और मथुरा पर संकट की पृष्ठभूमि में कृष्ण यादवों को पश्चिम दिशा की ओर ले जाते हैं। यात्रा के बाद वे समुद्र के निकट पहुँचते हैं। वहाँ का तटीय प्रदेश, वनस्पति, समुद्री हवा और विस्तृत भूमि कथा में नए नगर के चयन की पृष्ठभूमि बनते हैं। इसके बाद कृष्ण समुद्र के किनारे एक ऐसे भूभाग को देखते हैं जहाँ नगर बसाया जा सकता है। आख्यान में भूमि की प्रकृति, नगर के लिए उसकी उपयुक्तता और समुद्र से उसकी निकटता का वर्णन मिलता है। इस प्रकार द्वारका का जन्म केवल किसी चमत्कारिक नगरी की कल्पना के रूप में नहीं, बल्कि एक स्थान के चयन और वहाँ बसावट की कथा के रूप में भी सामने आता है। इस प्रसंग का पहला महत्त्व भौगोलिक है। कृष्ण-कथा में स्थान परिवर्तन का कारण राजनीतिक संकट है, लेकिन समाधान के लिए चुना गया स्थान अपने प्राकृतिक परिवेश के कारण भी महत्त्वपूर्ण है। समुद्र यहाँ केवल कथा की पृष्ठभूमि नह...
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (14-04-2013) के चर्चा मंच 1214 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ
ReplyDeleteपूरी रचना बहुत ही खूब.कुछ भी छोड़ दूं तो नाइंसाफी होगी.
ReplyDeleteवाह वाह वाह चंद पंक्तियों मे सब कुछ कह दिया लाजवाब अभिग्यक्ति
ReplyDeleteनवरात्रों की बहुत बहुत शुभकामनाये
ReplyDeleteआपके ब्लाग पर बहुत दिनों के बाद आने के लिए माफ़ी चाहता हूँ
बहुत खूब बेह्तरीन अभिव्यक्ति!शुभकामनायें
आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
मेरी मांग
bahut badhiya gager me sagar......
ReplyDeleteaabhar
Deleteश्रीवास्तव जी सादर,
ReplyDeleteबहुत खूब ... बहुत ही बढ़िया रचना .. बधाई !
एक गरीब मजदूर औरत के चित्र से न्याय करती हुई प्रस्तुति बहुत बढ़िया बधाई आपको|
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