औरत को महज़ बिस्तर मत समझिये,

 


औरत को महज़ बिस्तर मत समझिये,
अब इसे किसी से कमतर मत समझिये

किसी बच्ची की जाँ और अस्मत गयी है
इस बात को फकत  खबर मत समझिये

नश्तर बन के सीने मे उतर जायेगी,अब
औरत को फूलों का शजर मत समझिये

दफ़न हैं यहाँ किसी के नाज़ुक एहसास! 
मियाँ  इसे सिर्फ  कबर मत समझिये

बात करने का लहज़ा उसका सख्त है  
पर मुकेश को  पत्थर मत समझिये।।

मुकेश इलाहाबादी ----------------------

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है