जिंदगी तुझे अब ढूंढने कंहा जायें
जिंदगी तुझे अब ढूंढने कंहा जायें
अजनबी शहर है घूमने कहां जायें
समन्दर,झील,दरिया सब उथले हैं
ऑख बिन पानी डूबने कहां जायें
तुम भी रहते हो खफा, मनाते नही
छोड़ कर तुम्हे हम रुठने कहां जायें
सारे सावन विदा हो गये, तुमने भी
बाहें सिकोड ली है झूलने कहां जायें
वो अलग दौर था पी के बहकने का
अब पी भी लें तो झूमने कहां जायें
मुकेश इलाहाबादी .................
अजनबी शहर है घूमने कहां जायें
समन्दर,झील,दरिया सब उथले हैं
ऑख बिन पानी डूबने कहां जायें
तुम भी रहते हो खफा, मनाते नही
छोड़ कर तुम्हे हम रुठने कहां जायें
सारे सावन विदा हो गये, तुमने भी
बाहें सिकोड ली है झूलने कहां जायें
वो अलग दौर था पी के बहकने का
अब पी भी लें तो झूमने कहां जायें
मुकेश इलाहाबादी .................
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