जिन्दगी के सफे तुम सबके आगे यू खोला न करो

 

जिन्दगी के सफे तुम सबके आगे यू खोला न करो
किताबे मुहब्बत पढने का सलीका हर किसी का आता नही

मुकेष इलाहाबादी ..............................

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