महाभारत — मौसलपर्व - भाग ६ : जरा का बाण और कृष्ण का प्रस्थान
महाभारत — मौसलपर्व - भाग ६ : जरा का बाण और कृष्ण का प्रस्थान बलराम के प्रस्थान के बाद समुद्र का तट असाधारण रूप से शांत था। अभी कुछ समय पहले तक जहाँ यादवों की विशाल शक्ति, उत्सव और संघर्ष की स्मृतियाँ थीं, वहीं अब केवल समुद्र की लहरें थीं और उस विराट वंश के अंत की निस्तब्धता। कृष्ण एक वृक्ष के नीचे एकांत में बैठे थे। द्वारका के राजमहलों से दूर, युद्धों की राजनीति से दूर, अपने संबंधियों और मित्रों से दूर—मानो उनका जीवन जिस संसार को गति देता रहा था, अब उसी संसार से स्वयं पीछे हट रहा था। महाभारत यहाँ कृष्ण को किसी विजय-उत्सव के नायक के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे मनुष्य के रूप में दिखाता है जो अपने कार्य की अंतिम परिणति को सामने देख रहा है। उनका शरीर वृक्ष के नीचे था, पर कथा का संकेत इससे कहीं आगे जाता है। जिस युग को उन्होंने दिशा दी थी, वह समाप्त हो चुका था। उसी समय जरा नाम का एक शिकारी उस क्षेत्र में आया। दूर से उसे वृक्ष के नीचे कृष्ण के पैर का एक भाग दिखाई दिया। उसे वह किसी हिरण के शरीर का अंग प्रतीत हुआ। उसने अपना बाण छोड़ा। बाण जाकर कृष्ण के पैर में लगा। जरा निकट आया तो उसके सामन...