महाभारत — मौसलपर्व - भाग 2 : शाप के बाद का द्वारका
महाभारत — मौसलपर्व - भाग 2 : शाप के बाद का द्वारका
मूसल को नष्ट कर देने के बाद द्वारका में जीवन फिर सामान्य दिखाई देने लगा।
राजधानी अपनी समृद्धि में थी। यादवों के पास शक्ति थी, प्रतिष्ठा थी और श्रीकृष्ण का संरक्षण था। बाहर से देखने पर ऐसा कोई संकेत नहीं था कि इतनी विशाल और शक्तिशाली व्यवस्था शीघ्र ही अपने ही भीतर से टूटने वाली है।
लेकिन मौसलपर्व का वास्तविक तनाव यहीं से आरम्भ होता है।
विनाश तत्काल नहीं आता। पहले परिस्थितियाँ बदलती हैं। फिर व्यवहार बदलता है।
और अन्ततः वही व्यवहार घटनाओं का रूप ले लेता है।
यादवों के भीतर धीरे-धीरे उच्छृंखलता बढ़ने लगी। वे अपने सामर्थ्य और वंश-गौरव से इतने आश्वस्त थे कि ऋषियों के साथ किया गया उपहास भी उन्हें आरम्भ में गंभीर अपराध नहीं लगा था।
शाप मिलने के बाद भय अवश्य उत्पन्न हुआ, लेकिन भय ने उनके भीतर आत्मचिन्तन को जन्म नहीं दिया।
उन्होंने शाप के परिणाम को रोकने का प्रयास किया, पर उस मानसिकता को नहीं बदला जिसने शाप को जन्म दिया था।
यही अंतर इस कथा को गहरा बनाता है।
किसी संकट के बाहरी कारण को हटाना और संकट की मूल प्रवृत्ति को समाप्त करना दो अलग बातें हैं।
मूसल को पीस दिया गया। लेकिन अहंकार नहीं पिसा।
चूर्ण समुद्र में डाल दिया गया। लेकिन उच्छृंखलता भीतर ही रह गई।
समय बीतता गया। उधर श्रीकृष्ण सब कुछ देख रहे थे।
महाभारत कृष्ण को यहाँ किसी ऐसे शासक के रूप में प्रस्तुत नहीं करता जो प्रत्येक संकट को बलपूर्वक रोक दे। वे जानते थे कि कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें केवल बाहरी हस्तक्षेप से स्थायी रूप से नहीं रोका जा सकता।
कुरुक्षेत्र में भी उन्होंने अर्जुन को युद्ध के लिए बाध्य करने के स्थान पर उसे दृष्टि दी थी।
अब द्वारका में भी वही प्रश्न दूसरी भूमि पर उपस्थित था—
जब मनुष्य को परिणाम दिखाई देने लगें, तब क्या वह अपनी प्रवृत्ति बदलता है?
यादवों के बीच अनेक वीर थे।
सात्यकि, कृतवर्मा, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, साम्ब और अन्य योद्धा अपने-अपने पराक्रम के लिए प्रसिद्ध थे।
युद्ध का अनुभव भी उनके पास था। लेकिन युद्ध से अर्जित शक्ति और जीवन में अर्जित संयम एक ही वस्तु नहीं होते।
शस्त्र मनुष्य को बाहरी संघर्ष में विजयी बना सकते हैं।
वे उसे अपने क्रोध पर विजय दिलाएँ, यह आवश्यक नहीं।
यही वह बिन्दु है जहाँ मौसलपर्व धीरे-धीरे अपनी दिशा स्पष्ट करता है।
कुरुक्षेत्र में पाण्डवों और कौरवों के बीच संघर्ष था। वहाँ दो पक्ष आमने-सामने थे।
द्वारका में स्थिति अधिक भयावह बनने वाली थी—
यहाँ विभाजन किसी बाहरी शत्रु ने नहीं किया; एक ही वंश के भीतर पुराने मतभेद धीरे-धीरे विष का रूप लेने लगे।
समय ने कुरुक्षेत्र के घाव अभी पूरी तरह भरे भी नहीं थे कि एक नया संघर्ष जन्म लेने लगा।
यादवों के भीतर भी युद्ध की स्मृतियाँ थीं।
किसने किसका साथ दिया था, किसने किसके विरुद्ध युद्ध किया था—ये बातें समाप्त नहीं हुई थीं।
विशेषतः सात्यकि और कृतवर्मा जैसे योद्धाओं के बीच कुरुक्षेत्र की पुरानी घटनाओं की स्मृति जीवित थी।
युद्ध समाप्त हो जाने पर भी मनुष्य अपने भीतर युद्ध को लेकर चलता रहे, तो शांति केवल बाहरी परिस्थिति रह जाती है।
द्वारका में यही होने लगा था। फिर भी जीवन चलता रहा। समुद्र के किनारे उत्सव होते रहे।
यादव अपने सामर्थ्य में विश्वास करते रहे।
और तट पर वह घास उग चुकी थी जिसकी उत्पत्ति उसी मूसल के चूर्ण से हुई थी।
किसी को पता नहीं था कि साधारण दिखाई देने वाली यह घास आगे चलकर किस भयावह घटना की साक्षी बनेगी।
विनाश अब दिखाई नहीं दे रहा था—वह प्रतीक्षा कर रहा था।
और जब प्रतीक्षा समाप्त होगी, तब यादवों के हाथों में वही घास होगी जिसे उन्होंने कभी अस्त्र समझा भी नहीं था।
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