महाभारत — मौसलपर्व - भाग 1 : विनाश की भूमिका

महाभारत — मौसलपर्व - भाग 1 : विनाश की भूमिका

कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हुए वर्षों बीत चुके थे।

हस्तिनापुर में पाण्डवों का शासन स्थिर हो चुका था। धृतराष्ट्र, गांधारी और कुन्ती भी संसार से विदा हो चुके थे। युद्ध के प्रत्यक्ष पात्र एक-एक करके इतिहास का हिस्सा बन रहे थे।

लेकिन महाभारत की कथा अभी समाप्त नहीं हुई थी।

कुरुक्षेत्र के युद्ध ने केवल कुरुवंश को नहीं बदला था। उसके प्रभाव की एक दूसरी धारा द्वारका तक पहुँच चुकी थी।

यादवों ने युद्ध में अनेक प्रकार से भूमिका निभाई थी। श्रीकृष्ण स्वयं शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा के साथ पाण्डवों के सारथी बने थे, जबकि बलराम युद्ध से दूर रहे थे। यादववंश बाहरी रूप से अब भी शक्तिशाली और सम्पन्न था।

परन्तु किसी भी सभ्यता का संकट हमेशा बाहर से नहीं आता।

कभी-कभी उसका बीज उसके भीतर ही विकसित होने लगता है।

मौसलपर्व की शुरुआत इसी आन्तरिक विघटन से होती है।

यादवों के भीतर शक्ति, सम्पन्नता और युद्ध-कौशल तो था, लेकिन उसी के साथ अहंकार और उच्छृंखलता भी बढ़ने लगी थी। समय के साथ उनका सामर्थ्य उनके आत्मसंयम से बड़ा होता गया।

महाभारत यहाँ एक अत्यन्त सूक्ष्म प्रश्न उठाता है—

जिस शक्ति को नियंत्रित करने वाला विवेक कमजोर पड़ जाए, वही शक्ति कब विनाश का कारण बन जाती है?

द्वारका में जीवन चलता रहा।

श्रीकृष्ण वहाँ उपस्थित थे, लेकिन वे जानते थे कि समय की गति अब एक नए चरण में प्रवेश कर चुकी है।

कुरुक्षेत्र में उन्होंने अर्जुन को कर्म, आत्मा और धर्म का बोध कराया था। अब वही कृष्ण उस युग के अंतिम परिणाम को सामने से देखने वाले थे।

मौसलपर्व का वातावरण इसलिए युद्धभूमि जैसा नहीं है। यहाँ कोई बाहरी शत्रु यादवों को समाप्त करने नहीं आया।

विनाश का कारण धीरे-धीरे उनके अपने व्यवहार से जन्म लेता है।

एक दिन यादवकुमारों ने ऋषियों के साथ ऐसा उपहास किया जिसने आगे चलकर पूरे यादववंश के विनाश की भूमिका तैयार कर दी।

साम्ब को स्त्री के वेश में सजाया गया और ऋषियों से पूछा गया कि उसके गर्भ से पुत्र उत्पन्न होगा या पुत्री।

यह प्रश्न केवल हास्य के रूप में किया गया था।

लेकिन ऋषियों ने उस उपहास को गंभीरता से लिया और शाप दिया कि उसके गर्भ से एक मूसल उत्पन्न होगा जो यादवों के विनाश का कारण बनेगा।

साम्ब के शरीर से वास्तव में लोहे का एक मूसल निकला। अब उपहास भय में बदल चुका था।

यादवों ने उस मूसल को नष्ट करने का प्रयास किया। उसे पीसकर चूर्ण कर दिया गया और समुद्र में फेंक दिया गया।

लेकिन कथा यहीं समाप्त नहीं होती। मूसल का एक छोटा टुकड़ा नष्ट नहीं हो सका।

और समुद्र में फेंका गया चूर्ण तट पर उगने वाली एरक घास में परिवर्तित हो गया। बाहरी दृष्टि से यह एक साधारण वस्तु थी।

लेकिन भविष्य में यही घास यादवों के हाथों में विनाश का अस्त्र बनने वाली थी।

महाभारत की कथा में यह प्रसंग प्रतीकात्मक स्तर पर भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

विनाश का बीज प्रायः उसी समय बो दिया जाता है जब मनुष्य उसे महत्वहीन समझकर छोड़ देता है।

एक छोटा-सा उपहास। एक क्षण का अहंकार। एक अनियंत्रित प्रतिक्रिया।

और फिर घटनाएँ ऐसी दिशा पकड़ लेती हैं जिन्हें वापस मोड़ना कठिन हो जाता है।

मौसलपर्व इसी क्रम को सामने लाता है। 

यादवों के पास शक्ति थी। श्रीकृष्ण जैसे पुरुष थे। द्वारका जैसी समृद्ध नगरी थी।

फिर भी समय के सामने कोई बाहरी सुरक्षा पर्याप्त नहीं थी।

क्योंकि अब संघर्ष बाहर से नहीं, भीतर से उठने वाला था।

और यही इस पर्व की सबसे गहरी भूमिका है—

जब किसी समाज की शक्ति उसके आत्मसंयम से आगे निकल जाती है, तब उसका सबसे बड़ा शत्रु बाहर नहीं, उसके भीतर जन्म लेता है।

मूसल नष्ट कर दिया गया था। लेकिन उसका कारण अभी जीवित था। समय अपनी अगली चाल चल चुका था।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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