महाभारत — मौसलपर्व - भाग 3 : प्रभास की ओर

महाभारत — मौसलपर्व - भाग 3 : प्रभास की ओर

समय बीतता रहा।

द्वारका में जीवन ऊपर से सामान्य था, लेकिन यादवों के भीतर पुराने तनाव अब भी दबे हुए थे। मूसल का चूर्ण समुद्र में बह चुका था और उसके अवशेष से उत्पन्न एरक घास तट पर फैल चुकी थी।

किसी को यह ज्ञात नहीं था कि साधारण दिखाई देने वाली वही घास भविष्य में उनके हाथों का अस्त्र बनेगी।

इसी बीच एक और परिवर्तन दिखाई देने लगा।

श्रीकृष्ण ने यादवों को प्रभास क्षेत्र की यात्रा के लिए प्रेरित किया। यादवों का विशाल समुदाय वहाँ पहुँचा। तीर्थ का वातावरण था, पर उसके भीतर उत्सव और मदिरा का प्रभाव भी बढ़ता गया।

यहाँ से कथा धीरे-धीरे उस बिन्दु की ओर बढ़ती है जहाँ वर्षों से भीतर दबे हुए संघर्ष बाहर आने वाले थे।

प्रभास केवल एक तीर्थस्थल नहीं था।

वह अब यादवों के लिए उनके इतिहास का अंतिम मंच बनने जा रहा था।

वहाँ अनेक प्रमुख यादव एकत्र थे—सात्यकि, कृतवर्मा, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और अन्य वीर।

ये वही लोग थे जिन्होंने विभिन्न युद्धों में अपने पराक्रम का परिचय दिया था। लेकिन युद्ध का अनुभव मनुष्य को हमेशा संयमित नहीं करता।

कभी-कभी वह उसके भीतर अपने पराक्रम की स्मृति को और मजबूत कर देता है।

उत्सव के बीच मदिरापान बढ़ा। बातचीत होने लगी। बातचीत से पुरानी घटनाएँ सामने आईं।

और पुरानी घटनाओं के साथ पुराने आरोप भी लौट आए।

सात्यकि और कृतवर्मा के बीच कुरुक्षेत्र की स्मृतियों को लेकर तनाव उत्पन्न हुआ।

सात्यकि ने कृतवर्मा के पुराने कर्मों को लेकर कटु बातें कहीं। कृतवर्मा ने भी प्रत्युत्तर दिया।

यह केवल दो व्यक्तियों का विवाद नहीं था। इसके पीछे वर्षों से संचित युद्ध-स्मृतियाँ थीं।

कुरुक्षेत्र समाप्त हो चुका था, लेकिन कुरुक्षेत्र के भीतर जन्मे वैमनस्य अभी जीवित थे।

शब्द तीखे होते गए। सभा का वातावरण बदल गया। श्रीकृष्ण सब देख रहे थे।

लेकिन उन्होंने तत्काल हस्तक्षेप नहीं किया। यह मौन अत्यन्त अर्थपूर्ण है।

कृष्ण का हर मौन निष्क्रियता नहीं होता।

कभी-कभी मौन उस सीमा का संकेत होता है जहाँ मनुष्य को अपने कर्म के परिणाम का सामना स्वयं करना पड़ता है।

सात्यकि का क्रोध बढ़ता गया। अन्ततः उसने कृतवर्मा पर आक्रमण कर दिया और उसे मार डाला।

अब तक जो विवाद शब्दों में था, वह रक्त में बदल चुका था। यादवों के बीच हलचल मच गई।

एक व्यक्ति की हत्या ने पुराने पक्षों को फिर सक्रिय कर दिया। किसी ने सात्यकि का साथ दिया, किसी ने कृतवर्मा के पक्ष को।

और तभी उस घटना ने वह रूप लेना शुरू किया जिसकी भूमिका मूसल के शाप में पहले ही रखी जा चुकी थी।

तट पर उगी एरक घास सबके सामने थी। किसी ने उसे उखाड़ लिया।

और आश्चर्य— वह साधारण घास नहीं रही।

वह हाथ में आते ही कठोर मूसल के समान हो गई। क्षण भर में प्रभास का वातावरण बदल गया।

जो हाथ अभी तक उत्सव में थे, वे अब अस्त्र उठा चुके थे।

जिस वंश ने बाहरी शत्रुओं को पराजित किया था, वही अब अपने ही लोगों के सामने खड़ा था।

मूसल समुद्र में फेंक दिया गया था।

लेकिन उसका चूर्ण मिटा नहीं था। वह धरती पर लौट आया था। और अब वही मूसल यादवों के हाथों में था।

यह महाभारत की कथा का अत्यन्त गहरा बिन्दु है—

जिस विनाश को मनुष्य बाहर फेंक देता है, यदि उसकी जड़ भीतर जीवित हो, तो वह किसी न किसी रूप में वापस लौटता है।

प्रभास का उत्सव अब उत्सव नहीं रहा था। वह यादववंश के अंतिम संघर्ष में बदल चुका था।

और अगले ही क्षण वह होने वाला था जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी—

यादव यादवों के विरुद्ध खड़े होने वाले थे।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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