महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग १० : गृहस्थधर्म — परिवार से समाज तक

 महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग १० : गृहस्थधर्म — परिवार से समाज तक

भीष्म के उपदेश अब व्यक्ति के भीतर से निकलकर उसके सामाजिक जीवन में प्रवेश करते हैं।

युधिष्ठिर के सामने केवल एक राज्य नहीं था; युद्ध से टूटा हुआ एक समाज था। परिवार बिखर चुके थे, असंख्य स्त्रियाँ विधवा हुई थीं, वंश टूट गए थे और संबंधों की पुरानी संरचना बदल चुकी थी।

ऐसे समय में धर्म का प्रश्न केवल यह नहीं था कि व्यक्ति स्वयं कैसा जीवन जिए।

प्रश्न था—वह परिवार और समाज के प्रति अपना उत्तरदायित्व कैसे निभाए?

यहीं गृहस्थधर्म का महत्व सामने आता है।

गृहस्थ केवल भोगी नहीं

भारतीय जीवन-दृष्टि में गृहस्थाश्रम को केवल संसार में रहने और भौतिक सुख प्राप्त करने की अवस्था मानना अधूरा होगा।

गृहस्थ ही परिवार का पोषण करता है, अगली पीढ़ी का निर्माण करता है, अतिथि और आश्रितों की देखभाल करता है तथा सामाजिक व्यवस्था के अनेक दायित्वों को वहन करता है।

इसलिए गृहस्थ के लिए धर्म का अर्थ केवल निजी सदाचार नहीं।

उसका प्रत्येक निर्णय दूसरे जीवनों को प्रभावित करता है।

वह अकेला व्यक्ति नहीं रहता।

उसके कर्म का क्षेत्र परिवार बन जाता है।

अधिकार से पहले उत्तरदायित्व

गृहस्थ जीवन की एक बड़ी चुनौती यह है कि मनुष्य अपने अधिकारों को जल्दी पहचान लेता है, लेकिन अपने उत्तरदायित्वों को उतनी सहजता से नहीं।

पति के अधिकार के साथ पति का उत्तरदायित्व है।

पत्नी के अधिकार के साथ पत्नी का उत्तरदायित्व है।

माता-पिता के अधिकार के साथ संतानों के प्रति उनका दायित्व है।

संतान को सम्मान चाहिए तो उसे भी माता-पिता के प्रति उत्तरदायित्व समझना होगा।

इस प्रकार परिवार केवल अधिकारों का समूह नहीं है।

वह परस्पर उत्तरदायित्व की व्यवस्था है।

परिवार का वास्तविक आधार

परिवार केवल रक्त-संबंध से नहीं टिकता।

विश्वास, संवाद, मर्यादा और परस्पर सम्मान उसके वास्तविक आधार हैं।

रक्त संबंध व्यक्ति को परिवार में जन्म दे सकता है; लेकिन संबंधों की गुणवत्ता व्यवहार से बनती है।

यही कारण है कि महाभारत का पूरा आख्यान हमें परिवार की दो विपरीत संभावनाएँ दिखाता है।

एक ओर वही कुरुवंश है जिसमें पीढ़ियों की परंपरा, गुरु-शिष्य संबंध और पारिवारिक निष्ठा दिखाई देती है।

दूसरी ओर उसी परिवार में अविश्वास, प्रतिस्पर्धा और सत्ता-संघर्ष बढ़ता जाता है।

अर्थात् केवल बड़ा परिवार होना पर्याप्त नहीं।

परिवार की आंतरिक संस्कृति ही उसके भविष्य को निर्धारित करती है।

दाम्पत्य का अनुशासन

गृहस्थधर्म में दाम्पत्य संबंध का भी विशेष स्थान है।

दाम्पत्य को केवल आकर्षण या सामाजिक अनुबंध के रूप में देखना उसके व्यापक स्वरूप को सीमित कर देता है। उसमें सहयोग, विश्वास, आर्थिक उत्तरदायित्व, पारिवारिक निर्णय और कठिन समय में साथ खड़े रहने की क्षमता भी शामिल है।

यहाँ अनुशासन का अर्थ किसी एक व्यक्ति का दूसरे पर नियंत्रण नहीं है।

बल्कि—

दो स्वतंत्र व्यक्तियों का साझा जीवन में मर्यादित और उत्तरदायी आचरण।

महाभारत के स्त्री-पुरुष संबंधों को पढ़ते समय यह भी ध्यान रखना होगा कि ग्रंथ में वर्णित सामाजिक व्यवस्था अपने प्राचीन ऐतिहासिक संदर्भ से जुड़ी हुई है। उसके प्रत्येक सामाजिक नियम को आधुनिक जीवन पर यथावत लागू करना उचित नहीं होगा।

लेकिन उसके भीतर मौजूद प्रश्न आज भी महत्वपूर्ण हैं—

संबंध में सम्मान कितना है?
निर्णय में सहभागिता कितनी है?
दायित्व का विभाजन कैसा है?
और शक्ति का उपयोग किस प्रकार होता है?

संतान और अगली पीढ़ी

गृहस्थ का एक महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व अगली पीढ़ी का निर्माण है।

लेकिन संतान को केवल संपत्ति देकर, शिक्षा दिलाकर या सामाजिक प्रतिष्ठा देकर उसका दायित्व पूरा नहीं होता।

वह जिस वातावरण में बड़ी होती है, वही उसके व्यक्तित्व की प्रारंभिक संरचना बनाता है।

यदि घर में संवाद है तो संवाद सीखती है।

यदि घर में भय है तो भय सीखती है।

यदि घर में सत्य और उत्तरदायित्व है तो वे जीवन के स्वाभाविक मूल्य बन सकते हैं।

इसलिए परिवार पहला सामाजिक विद्यालय है।

गृहस्थ और समाज

गृहस्थ का जीवन घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहता।

वह उत्पादन करता है, संसाधन अर्जित करता है, दान करता है, अतिथि का सत्कार करता है, सामाजिक संबंध बनाए रखता है और अगली पीढ़ी को तैयार करता है।

इस दृष्टि से गृहस्थधर्म व्यक्तिगत सुख और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच सेतु बनता है।

भीष्म की शिक्षा में इसलिए संयम का अर्थ संसार छोड़ देना नहीं है।

संसार में रहते हुए अपनी इच्छाओं को ऐसी सीमा देना है कि वे दूसरों के अधिकारों को नष्ट न करें।

युद्ध के बाद गृहस्थधर्म का नया अर्थ

कुरुक्षेत्र ने हजारों परिवारों को समाप्त कर दिया था।

अब युधिष्ठिर के सामने चुनौती थी कि बचे हुए परिवारों को फिर से जीवन मिले।

इसलिए गृहस्थधर्म यहाँ केवल शास्त्रीय नियम नहीं रह जाता।

वह सभ्यता के पुनर्निर्माण का प्रश्न बन जाता है।

युद्ध राज्य की सीमाएँ बदल सकता है।

लेकिन समाज को पुनः खड़ा करने का काम परिवारों को करना पड़ता है।

इसलिए अनुशासनपर्व में गृहस्थधर्म की चर्चा वास्तव में उस व्यापक प्रश्न का उत्तर खोजती है—

एक विनष्ट समाज फिर से जीवन की सामान्य लय कैसे प्राप्त करे?

यहीं से भीष्म की शिक्षा परिवार से आगे बढ़कर समाज में स्त्री की भूमिका, सम्मान और संरक्षण के प्रश्नों की ओर जाती है—और यह अनुशासनपर्व के उन अंशों में प्रवेश है जिन्हें आधुनिक दृष्टि से पढ़ते समय मूल पाठ और उसके ऐतिहासिक संदर्भ, दोनों को साथ रखना आवश्यक होगा।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

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