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रह रह के धूप छांह आती रही
रह रह के धूप छांह आती रही चिलमन से वह झांक जाती रही दरिया के साहिल पे बैठा हूं चुप
लहरें आती रहीं और जाती रहीजब जब वक्त ने स्याही फैलायी हंसी उसकी चॉदनी फैलाती रही मुकेष इलाहाबादी ............
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