एक दिन मै अपने दिले आइना से

एक दिन मै
अपने दिले आइना से
रुबरु हुआ मेरे एक नही
कई कई रुप हैं
महसूस हुआ

झूठा चोर आलसी
स्वार्थी के साथ साथ
बाहर से लेकर अंदर
तक गंदा भी हू मालूम हुआ
मैने घबरा कर
अपने मुह को पोछा
बालों को कंघी किया
और अपने को
कई कई एंगल से देखने लगा

दिले आइना हंसने लगा
जिस्म चमकाने से रुह नही चमकती
एंगल बदलने से सच नही बदलते
मै कुछ शरमा गया
कुछ और ज्यादा घबरा गया
दिले आइना पे परदा लगा दिया

अब मै अपने नही
दूसरों के आइने मे देखता हूं
और अपना काम चला लेता हूं

मुकेश इलाहाबादी ..................

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