इन्सानियत के लिबास मे रह्ता था

इन्सानियत के लिबास मे रह्ता था
अमीरो गरीब सबसे मिला करता था

चुभे थे बेसुमार खन्ज़र दिल मे मगर
लबों पे मुस्कुराहट सजाये रखता था

मुहब्बत से बडा कोई भी मज़हब नही
यही बात वह बार बार कहा  करता था

बद्शाहियत तो उसकी फितरत मे थी
भले ही  दौलत से फकीर दिखता था

अज़ब तबियत का शख़्श था मुकेश
मोम के पैरों से आग पे चल्ता था

मुकेश इलाहाबादी -------------------

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