ये कैसा ग़म था हमें रोना न आया

ये कैसा ग़म था हमें रोना न आया
तुम बदल गए हमें जताना न आया

मुद्दत से जो इक दर्द है दिल में निहां
उस दर्द की कहानी सुनाना न आया

धूप ही धुप मिली हमको सफ़र में
छाँव हो ऐसा कोई ठिकाना न आया


कभी आंधी तो कभी तूफान आया
मुकेश मंज़र कोई सुहाना न आया

मुकेश इलाहाबादी -------------------

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